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तर्क व्यवस्था नरक की पहली सीडी और पराइन्द्रिय ग्रन्थि व्यवस्था स्वर्ग का अंतिम सोपान- एक गूढ़ अन्वेषण

*तर्क व्यवस्था नरक की पहली सीडी और पराइन्द्रिय ग्रन्थि व्यवस्था स्वर्ग का अंतिम सोपान- एक गूढ़ अन्वेषण*
🍁🍁9*4*5💐💐💐💐🇮🇳
कभी कभी आपके मन मे आता होगा क़ि क्या क्या बजहें है बहुजनों की इतनी बुरी हालात की?
जिसके अध्ययन मे मैने पाया क़ि बहुजन समाज की सभी हारों का मूल कारण है। इन्द्रियों द्वारा निर्मित शब्द रूपी विचारों (किताबी ज्ञान) को आपस मे मिलाते रहना।
जिसका निर्धारण अबोध शिशु अवस्था मे ही शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक लोकलाज रूपी माँ बाप के दबाव के माध्यम से बाल्यकाल मे ही कर दिया जाता है।
बाद मे हम कभी भी किसी भी व्यक्ति की बात को स्वीकारने या नकारने के समय पर अपने शिशुकाल मे माँ बाप या समाज द्वारा दिमाग मे बैठा दी गई। कथित अच्छी या बुरी बातों/ स्मृतियों से जीवन भर मिलान (tag) करके स्वीकार या अस्वीकार करते रहते हैं।
जो जरूरी नही क़ि सही हों...
इसी स्वीकार्यता या अस्वीकार्ता को ही हम ठेंगा (👍👎) या पसंद (like)/नापसंद या अपनी हां या न के रूप मे जीवन भर प्रदर्शित करते रहते हैं।
चूंकि इस पसंद नापसंद का निर्धारण माँ बाप या शिक्षको द्वारा बाल्यकाल से लगातार किया जाता है। इसलिए हमेशा यह शब्द रूपी अच्छी या कथित बुरी बातें एक तश्वीर रूप मे दिमाग मे बैठ जाती हैं। इन तश्वीर रूपी स्मृतियों से ही जीवन भर हम इन्शान विभिन्न निर्णय करते रहते हैं। जो अक्सर गलत ही होते हैं।
ये बाल्यकाल मे निर्धारित की गई तस्वीरों से ही व्यक्ति विभिन्न विचार रूपी विकारों के चंगुल मे आकर अवसादग्रस्त जीवन जीने को मजबूर होता रहता है।

*दिमाग की इस tagging तकनीक को response to stimulus कहा जाता है।* जो एक कोशिकीय जीवों से लेकर बहुकोशिकीय इन्शानो तक मे एक समान तरह से काम करती है।

चूंकि यह व्यवस्था मानव इन्द्रिय निर्मित व स्वीकृत विचार रूपी *विकारो* पर टिकी है।
इसी लिए जब हमारी पूर्व की स्मृति के आधार पर कोई बात कही जाती है तो हम उसे स्वीकार कर अच्छा मान लेते हैं।
जबकि पूर्व स्मृति से भिन्न कही गई बात को हम अस्वीकार कर देतें हैं। जबकि यह दोनो ही तरह की प्रतिक्रियाओं का होना दूसरे की जूठन रूपी ज्ञान पर आधारित है। निज अनुभव पर नही।
इसलिए यह जरूरी नही है क़ि जो आपको आपके माँ बाप शिक्षको या समाज द्वारा दिमाग के स्मृतिलोक मे बैठाया गया हो, वह सही ही हो।
चूंकि इस tagging मे स्वीकार्यता या अस्वीकार्यता इन्द्रियों द्वारा होती है। इसी पसंद नपसंद मे बहुजन समाज के लोग परेशान हैरान चिड़चिड़े गुस्सेबाज आदि हो जाते हैं।
चूंकि मानव इन्द्रियाँ सामान्यता बाहरी बातावरण या सामाजिक दबाव द्वारा निर्णीत होती हैं। इसलिए परमआवश्यक रूप से यह विचार रूपी विकार हमारे न चाहते हुए भी खुद के दुश्मन का favour करते रहते हैं।
भले ही आपके शब्द वाण इन सबका खंडन करते रहें मगर आपके क्रिया कलाप (actions) हमेशा दुश्मन के समर्थक बने रहते हैं।
चूंकि ऐसे लोग विरोधाभासी जीवन जी रहे होते है । इसलिये हमेशा मानसिक अंतर्द्वन्द मे ही जीने को मजबूर होते हैं। जिसकी परिणिति हृदय आघात, पक्षाघात, मधुमेय आदि बीमारियों के रुप मे होती है। और जीवन लीला समाप्त....
ऐसे लोगों का पूरा जीवन ही एक internal conflict बन जाता है।
अर्थात बहुजन समाज की विजय तब तक नही हो सकती जब तक यह अंतर्द्वंद रूपी जीवन शैली खत्म नही कर दी जाती।
जब तक बहुजन समाज के चंद लोग इस महत्वपूर्ण बात को जान व मान नही लेते।

यही बजह है की मनुवादियों का शासन लगातार दीर्घकालीन समय से जारी है।
इसलिये भी जारी है क्योंकि आप इन्द्रिय उपयोग से विचारों की तार्किक tagging मे लगे रह कर किसी की बात पर right या 👍👎 ठेंगा दिखा कर आपसी झगड़ा मे व्यस्त रहते हैं।
जबकि मनुमानुष् इन इन्द्रियों से परे पराइंद्रीय शारीरिक व्यवस्था का उपयोग बहुजनो को ठिकाने लगाने के लिए करते हैं। जिसमे वो सहज अनुभूतियाँ जैसे डर जिसका निर्धारण स्वाधिष्ठान चक्र से होता है, का उपयोग विरोधियों के लिए करते हैं। इस डर को नियंत्रण करने का काम thyroid ग्रंथि करती है। चूंकि आज प्रत्येक बहुजन किसी न किसी डर मे जी रहा है। इसीलिए बहुसंख्य बहुजन thyroid की समस्या से ग्रसित भी है। स्त्रियां तो विशेषकर, 🤔आज कल पुरुषप्रधान समाज मे केवल किसी का स्त्री होना ही स्व भयभीत बने रहने के लिए काफी है। इसीलिए स्त्रियों मे thyroid की समस्या पुरुषो की तुलना मे कुछ ज्यादा ही पाई जाती है।
*जैसे प्रेम,* इस *प्रेम या नफरत को करने का निर्धारण हृदय नाडी करती है। जिसको कोइ बहुजन जानता भी नही है। प्रेम करना तो दूर की बात है।* इसीलिए हर कोई बहुजन एक दूसरे से नफरत ही करता है। दिखावा चाहे वो जो भी करे। जिसे आजकल लोग प्रेम कहते हैं वह प्रेम नही बल्कि हवश होता है। इस हवश की पूर्ति शादी के उपरान्त होने के कारण ही परिवार टूटते हैं। पारिवारिक कलह व्याप्त है। इसीलिए कोर्ट कचहरी थाना अदालत जीवित हैं।
इसीलिए यदि हमे मानुमानुषो पर बहुजनो की विजय स्थापित करनी है तो हमे मानव इन्द्रियों को छोड़कर पराइंद्रीय ग्रंथि व चक्र व्यवस्था को हथियार बनाना होगा।
जो तब तक हाशिल नही हो सकती जब तक आपके लिए तर्क मुख्य हथियार बना हुआ है।
इसीलिए कहा गया है क़ि *जहां तर्क है वहां नर्क है।*
*जहां समर्पण है वहां शौहार्द है*।
चूंकि तर्क का उपयोग भौतिकतावादी लोगों ने विचारों या ज्ञान के quantification के लिए किया हुआ है। इसीलिए यह तर्क विचारधारा बहुसंख्य बुद्धिहीन जीवन जीने वालों के लिए महाकाल व ऊँच नींच या छोटे बड़े अथवा गरीब अमीर का कारण बना हुआ है।
हालांकि आपको यह बात समझ आ जायेगी तब जब आप अम्बेडकरवादी दृष्टि से नही बल्कि असली बुद्धवादी दृष्टिकोण से देखना शुरू करोगे तब।
जिसमे आपको पारंगत होना ही होगा।
बिडम्बना ये है क़ि बहुजन अभी इन्द्रियों को भी समझ नही सके हैं भला उन्हें मेरी बात समझ आएगी? मुझे संसय है।
मेरी ये बातें ज्यादातर उन लोगों को नही समझ आएगी जो सेल्फीबाज या चर्बीदार हैं।
बात जिस गहराई से कहीं गई है यदि आप उसके आसपास भी नही है तो कुछ भी समझ आने वाला नहीं है।
खैर आप प्रयास तो करो...

*तो आपको क्या चाहिए सौहार्द या नरक???*

*तो आप किसका उपयोग करना चाहोगे खइके पान बनारस वाली इन्द्रियों का या पराइंद्रीय ग्रंथि व चक्र व्यवस्था का???*
आपको जो उचित लगे चुन लेना।
आपका मंगल हो💐
भवतु सब्ब मंगलं
स्वामी डॉ बोधी आनंद
जय भुमि नमो भारत🇮🇳

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