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प्रज्ञा की एक बूंद है - Cholecystectomy

आज विमर्श करना चाहूंगा पित्ताशय पर।  वैसे वात पित्त कफ त्रिगुणों पर पूरा आयुर्वेद केंद्रित है। जिस पर भारत सरकार का एक पूरा आयुष मंत्रालय सेवारत है जिससे इस वात पित्त कफ की वृहदता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। जिस परंपरागत तौर में मैं अभी कुछ भी नहीं कहूंगा। आज बात होगी अक्सर भारत में पित्त की पथरी की समस्या के कारण होने वाले ऑपरेशन और उस दौरान प्रयोग किए जाने वाले एक शब्द Cholecystectomy पर जो बना है Latin भाषा के शब्द से। अर्थात cholecystomy शब्द तीन अलग अलग भाषाओं के शब्दों को मिलकर बनाया गया है। जो हैं chole दूसरा है cyst और तीसरा है ectomy ग्रीक भाषा का शब्द chole लैटिन भाषा में से नकल किया गया है जहां chole शब्द बन गया kholi जो पुनः भारतीय यूरोपीय भाषा परिवार के शब्द "ghel" से बना हुआ है जिसका मतलब होता है "shine" चमक वह भी विशेषकर हरी या पीले रंग की जो होती है पित्त का मूल रंग है पित्त और पित्त की थैली का। वहीं दूसरा शब्द जो उक्त Cholecystectomy का अंग है। वह शब्द है cyst जो लैटिन भाषा में cyst कहलाता है जबकि ग्रीक भाषा  "kystis" जिसका मतलब ह...
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क्या धर्म सच में अफीम है?

 अक्सर हमने कम्युनिस्टो से सुना और उनका लिखा हुआ पढ़ा है कि कार्ल मार्क्स ने लिखा था कि "धर्म अफीम है।"  लेकिन जब मैने इस तथ्य की गहन पड़ताल की तो कार्ल मार्क्स रचित पुस्तक Marx, A Contribution to the Critique of Hegel's Philosophy of Right (1843-44) के पेज संख्या १ पर निम्न बात लिखी हुई पाई "Religious suffering is, at one and the same time, the expression of real suffering and a protest against real suffering. Religion is the sigh of the oppressed creature, the heart of a heartless world, and the soul of soulless conditions. It is the opium of the people." अर्थात धार्मिक पीड़ा है, एक ही समय में, वास्तविक पीड़ा की "अभिव्यक्ति" और वास्तविक पीड़ा के "विरुद्ध विरोध" दोनों है। धर्म उत्पीड़ित प्राणीयों की "आह" है, हृदयविहीन संसार का "हृदय" है, और आत्मा विहीन परिस्थितियों की "आत्मा" है। यह लोगों की अफीम "(दवा)" है। ज्ञात रहे कि अफीम पाषाणकाल से ही दवा के रूप में जानी जाती रही है। अफीम के तेल आदि उत्पाद आदि ब...

राष्ट्र बनाम धर्म या राष्ट्र बनाम "हम भारत के लोग"?

प्रकरण संख्या 1 राष्ट्र के खिलाफ बगावत हेतु संविधान में दंडविधान निम्नवत हैं :- १-आईपीसी के सेक्शन 121 और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 147 के अनुसार राज्य/भारत के खिलाफ युद्ध खड़ा करने पर मृत्युदंड, आजीवन कारावास या व जुर्माना किया जा सकता है। २- आईपीसी के सेक्शन 121A और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 150 के अनुसार राष्ट्र के खिलाफ षड्यंत्र रचने पर आजीवन कारावास, 10 साल कैद या व जुर्माना लगाया जा सकता है। ३- आईपीसी के सेक्शन 122 और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 149 अनुसार राज्य के खिलाफ युद्ध की नियत से हथियार जुटाने पर आजीवन कारावास, 10 साल की जेल, या व जुर्माना लगाया जा सकता है। ४- आईपीसी के 123 और BNS के 148 के अनुसार राज्य के खिलाफ युद्ध की नियत से कुछ भी छिपाना 10 साल की उम्रकैद और जुर्माना थोपा जा सकता है। ५- आईपीसी के सेक्शन 124 और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 151 अनुसार राष्ट्रपति, राज्यपाल आदि पर सरकारी कामकाज में बाधा की नियति से हमला करने पर 7 साल की जेल और जुर्माना लगाया जा सकता है। ६- आईपीसी के सेक्शन 124A और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 152 के अनुसार राज्य सत्ता के खिला...

Tiredness: A Creeping Disorder or a Disease?

  Tiredness: A Creeping Disorder or a Disease? -Written and composed by Dr. Siddhika Singh         Have you ever felt tired even after a full night’s sleep? Do you get breathless after climbing just a flight of stairs, or find yourself losing focus easily? These signs, often dismissed as “normal tiredness,” could be something more—something as common yet overlooked as Anemia. Anemia is a silent creeper that has millions of people in its hold. More than 65% of children and about 60% adolescent girls, more than 55% women, about 50% pregnant women and about 30% of males suffer from anemia in India. Adolescent girls and low socioeconomic classes are at the highest risk of anemia all across India. Anemia is a serious illness; it degrades our quality of life significantly with time. This quality of life is nothing else than our working capacity and overall attitude toward world around us. The most commonly found anemia is India is Iron Deficiency Anemia. Daily iron r...

जयभीम या जय मीम?

अक्सर आज के राजनेता जयभीम को जय मीम से जोड़ने की नाकाम कोशिश करते रहते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या स्वयं डॉ बाबासाहब अंबेडकर मुस्लिमपरस्त थे? जैसा कि आजकल बहुजन राजनेताओं में देखा जा रहा है। जिसको जानने के लिए स्वयं चलते हैं बाबासाहब अंबेडकर रचित राइटिंग एंड स्पीचेज खंड संख्या १४ के भाग २ पेज संख्या 1319 से 1327 पर जहां पर डॉ बाबासाहब अंबेडकर लिखते हैं कि "out of 350 crores of rupees of revenue we raise annually, we spend about 180 crores on army. अर्थात बाबासाहब लिखते हैं कि आधे से ज्यादा भारत देश का बजट तो इसी आर्मी पर खत्म हुआ जा रहा है वह भी मुसलमान भूभाग में मुस्लिम आबादी हेतु रोटी सब्जी अनाज रोड दवाओं आदि की सुविधाएं देने में वहीं डा बाबासाहब अंबेडकर पेज 1322 पर लिखते हैं कि "हमारा पाकिस्तान से झगडा हमारी विदेश नीति का हिस्सा है। जिसका असली समाधान है कि "The real solution is to partition the kashmir. Give hindu and Buddhist part to India and Muslim part to Pakistan. अर्थात इस कश्मीर मामले का असली समाधान है कि हिन्दु और बौद्ध भूभाग भारत को दे दिया जाए और मुस्लिम हि...

May day या मजदूर दिवस: एक विहंगम दृष्टिपात

 पहली मई को मजदूर दिवस संपूर्ण विश्व में मनाया जाता है। इसका इतिहास भूगोल से मुझे कोई वास्ता नहीं लेकिन इसकी पीछे की वजहों को जानना मेरा मौलिक अधिकार है। कार्ल मार्क्स पक्का नशेड़ी था क्योंकि यह कहता है कि दुनिया के मजदूरों एक हो पूंजीवाद को उखाड़ फेंको। अब पूँछो कि इसमें ग़लत क्या है। मजदूरों को एकजुट होने की जरूरत तभी तक है जब तक वे मजदूर हैं और जब तक वे मजदूर हैं तभी तक दूसरे लोग मालिक (पूंजीपति) भी हैं। मालिक व मज़दूरों के बीच स्थायी संघर्ष अन्तिमता मालिक पूंजीपतियों को ही मजबूत करता आया है। भला भेड़ व सांड में युध्द होने पर भेड़ की जीत की उम्मीद लगाना कहाँ की चतुराई है। यह संघर्ष स्थायी रूप से चलता रहे इसलिए मजदूरों को गंदगी में सड़ते हुए गंदगी को स्थायी बनाये रखने हेतु एकजुट होना जरूरी हैं। यह सोच के साथ उक्त नारा पूरे विश्व में उछाला गया। जब तक मालिक मजदूरों में संघर्ष चलता रहेगा तभी तक मालिक "मालिक" रह सकेंगे और मजदूर भाई बहन "मजदूर'। यह बात औसत बुद्धि इंसान को तब तक समझ नही आयेगी जब तक वह खुद के खाने पीने मौज मस्ती के लिए संघर्षरत है। इस दैनिक भरणपोषण संघर्ष से ऊपर...

नारी सशक्तिकरण या स्टेट द्वारा स्त्री जाति का धरती से निपटान-एक विमर्श

  नारी सशक्तिकरण का रायता पूरे देश में फैला है। ऐसे में जबकि स्त्री को पुरुष के खिलाफ misuse किया जा रहा है नारी सशक्तिकरण की हकीकत को समझना बेहद जरूरी हो जाता है। ध्यान रहे यह लेख किसी स्त्री या राष्ट्र के विपरीत नहीं सम्यक शैक्षणिक विश्लेषण मात्र है। सवाल यह उठता है कि आखिर नारी सशक्तिकरण है क्या। 1- हम सशक्त महिला कहते किसे हैं। क्या सशक्त महिला वह है जो पुरुषों जैसे परिधान पहनती हैं  2- क्या सशक्त महिला वह है जो पुरुषों के तौर तरीकों की नकल करती है। 3- क्या सशक्त महिला वह है जो पुरुषों की मानसिकता को आत्मार्पित कर रही हैं। 4- क्या सशक्त महिला वह है जिसके प्रजनन अंग भी गाली गलौज के शिकार हैं।  उक्त सभी सवाल तब और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब नारियों माताओं बहनों पत्नी नानी दादी आदि भी भूमिका "स्टेट" स्वयं निभा रहा हो। नारी तभी सशक्त बन सकती है जब नारी का स्त्रीत्व सम्मानित हो। अन्यथा यह बेहद गंभीर छलावा है कि एक तरफ़ नारी सशक्तिकरण के नाम से नारी शरीर का हथियार की इस्तेमाल करके घर परिवार तोड़े जाते रहें दूसरी ओर स्टेट स्वयं कृत्रिम गर्भाधान, टेस्ट ट्यूब बेबी, कृत्रिम बच...