*भगवान बुद्ध ने प्रवज्जा क्यों ग्रहण की???*
💐💐9*4*5🌹🌹🌹🌹🇮🇳
डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर लिखित *बुद्ध व उनका धम्म* किताब मे उन्होंने बताया क़ि कोलियों व शाक्यो मे रोहिणी नदी के जल बटवारे को लेकर हमेशा विवाद रहता था।
इसी को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की पूर्ण कोशिश के बाद भी जब शाक्य व कोलिय नही माने तो भगवान बुद्ध ने परेशान होकर पृवज्जा लेकर घर परिवार छोड़ दिया।
*क्या आप पूज्य डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर के उक्त कथन से पूर्ण सहमत हैं???* 🤔
यदि हां ।।।।
तो आज किसी को बुद्ध धर्म को न तो ग्रहण करने की जरूरत है और न ही जातीय आधार पर बंटे भारतीयों मे कोलिय व शाक्य जातियों के अलावा किसी को भगवान बुद्ध को अपना मानने की जरूरत बची।
भारत को बुद्धत्व प्राप्त भारत बनाने की बात को तो फिलहाल छोड़ ही दिया जाये।
जबकि वही पूज्य डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर अपनी अंतिम क्रांति ज्योति भी बौद्ध धर्म स्वीकार करके शुरू कर गए।
ऐसे मे कहीं कोई लोचा जरूर है जिसकी बजह से उनके विचार आपस मे contradict कर रहे हैं??
*आप कैसे सुलझओगे इस गुत्थी को?*
*आज न तो रोहिणी जल विवाद बचा और न ही कोलियों शाक्यों के बीच कोई विवाद।*
यदि कोई विवाद है भी तो उसे शाक्य व कोलिय जानें।
किसी चमार, महार, कोरी, कहार, अहीर, गड़रिया, भंगी, पासी, कुम्हार आदि को क्या जरूरत है क़ि वो बुद्ध के धर्म से चिपका घूमे?
अर्थात *कहीं परम पूज्य डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने buddha and his dhamma मे भगवान बुद्ध की पृवज्जा के कारण गिनाने मे कोई बड़ी भूल तो नही की???*
मेरे बिचार से उन्होंने बौध्द धर्म को उथली राजनीति के नजरिये से देखा समझा है। जबकि पृवज्जा के प्रचलित कारणो के पीछे बहुत सोची समझी रणनीति थी।
जन्म लेना, बीमार होना, मर जाना आदि प्रत्येक मनुष्य के जीवन की मौलिक घटनाये हैं। जो क़ि दुख का मूल कारण है। जिससे बौद्व धर्म की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहती है। परिणामस्वरूप धम्म स्वीकारोक्ति भी लगातार स्वचालित रहती।
लेकिन रोहिणी नदी व कोलिय शाक्य विवाद घुसा कर डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने पूरे बौद्ध धर्म का बैंड बजाकर बौद्ध धर्म की नीव ही हिलाकर रख दी।
आज वही बजह है क़ि लोग बौद्ध धर्म से लगातार दूरी बनाये हुए हैं। जिससे डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर का भारत बौध्दमय करने का सपना अधूरा पड़ा हुआ है। जो शायद ही इस बहुत बड़े विरोधाभास के बने रहते पूरा हो सके।
आपकी धम्म यात्रा मंगलमय हो।🇮🇳💐
भवतु सब्ब मंगलं
स्वामी डॉ बोधी आनंद
जय भूमि नमो भारत
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डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर लिखित *बुद्ध व उनका धम्म* किताब मे उन्होंने बताया क़ि कोलियों व शाक्यो मे रोहिणी नदी के जल बटवारे को लेकर हमेशा विवाद रहता था।
इसी को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की पूर्ण कोशिश के बाद भी जब शाक्य व कोलिय नही माने तो भगवान बुद्ध ने परेशान होकर पृवज्जा लेकर घर परिवार छोड़ दिया।
*क्या आप पूज्य डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर के उक्त कथन से पूर्ण सहमत हैं???* 🤔
यदि हां ।।।।
तो आज किसी को बुद्ध धर्म को न तो ग्रहण करने की जरूरत है और न ही जातीय आधार पर बंटे भारतीयों मे कोलिय व शाक्य जातियों के अलावा किसी को भगवान बुद्ध को अपना मानने की जरूरत बची।
भारत को बुद्धत्व प्राप्त भारत बनाने की बात को तो फिलहाल छोड़ ही दिया जाये।
जबकि वही पूज्य डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर अपनी अंतिम क्रांति ज्योति भी बौद्ध धर्म स्वीकार करके शुरू कर गए।
ऐसे मे कहीं कोई लोचा जरूर है जिसकी बजह से उनके विचार आपस मे contradict कर रहे हैं??
*आप कैसे सुलझओगे इस गुत्थी को?*
*आज न तो रोहिणी जल विवाद बचा और न ही कोलियों शाक्यों के बीच कोई विवाद।*
यदि कोई विवाद है भी तो उसे शाक्य व कोलिय जानें।
किसी चमार, महार, कोरी, कहार, अहीर, गड़रिया, भंगी, पासी, कुम्हार आदि को क्या जरूरत है क़ि वो बुद्ध के धर्म से चिपका घूमे?
अर्थात *कहीं परम पूज्य डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने buddha and his dhamma मे भगवान बुद्ध की पृवज्जा के कारण गिनाने मे कोई बड़ी भूल तो नही की???*
मेरे बिचार से उन्होंने बौध्द धर्म को उथली राजनीति के नजरिये से देखा समझा है। जबकि पृवज्जा के प्रचलित कारणो के पीछे बहुत सोची समझी रणनीति थी।
जन्म लेना, बीमार होना, मर जाना आदि प्रत्येक मनुष्य के जीवन की मौलिक घटनाये हैं। जो क़ि दुख का मूल कारण है। जिससे बौद्व धर्म की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहती है। परिणामस्वरूप धम्म स्वीकारोक्ति भी लगातार स्वचालित रहती।
लेकिन रोहिणी नदी व कोलिय शाक्य विवाद घुसा कर डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने पूरे बौद्ध धर्म का बैंड बजाकर बौद्ध धर्म की नीव ही हिलाकर रख दी।
आज वही बजह है क़ि लोग बौद्ध धर्म से लगातार दूरी बनाये हुए हैं। जिससे डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर का भारत बौध्दमय करने का सपना अधूरा पड़ा हुआ है। जो शायद ही इस बहुत बड़े विरोधाभास के बने रहते पूरा हो सके।
आपकी धम्म यात्रा मंगलमय हो।🇮🇳💐
भवतु सब्ब मंगलं
स्वामी डॉ बोधी आनंद
जय भूमि नमो भारत
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