*हनुमान की पूँछ मे लगन न पाई आग।*
ब्राह्मण धर्म प्रतीकों व चिन्हों का पुलिंदा है। इन मूर्तियो व तस्वीर रूपी प्रतीकों मे छुपे बुद्धिज्म को हासिल कर ब्राह्मण धर्म को *हजम* करना बहुत आसान है।
मगर आप है क़ि उन्ही झूठे प्रतीक चिन्हों व कहानियों की उधेड़ बुन मे लगे हैं जो मूर्खो से अपनी बात मनवाने के लिए exaggerate (मट्ठा बढ़ाना) की गयी हैं।
ये मट्ठा बढ़ाना ही तो है जब कहा जाता है क़ि *हनुमान की पूँछ मे लगन न पाई आग। लंका सारी जल गई गए निशाचर भाग*। ये भाषा शैली अलंकारित भाषा शैली है। जिसे सुन कर अविवेकी व नासमझ इन्शान तुरंत नतमस्तक हो जाता है। उसके मन मे तुरन्त विचार आता है *अरे साला पुंछ मे आग लगी ही नही और पूरी लंका जल भी गयी। वाह क्या बात है😱*।
जो लेखक व वक्ता की बात को प्रभावी ढंग से communicate कर देती है। क्योंकि अंतिम उद्देश्य *अपनी बात दूसरों को स्वीकार कराना होता है। फिर चाहे वह तर्क व विज्ञान से समझाओ या अलंकारित कहानियो या भाषा शैली से।*
उम्मीद है क़ि इतनी simple बात आप स्वयं समझेगे व दूसरों को भी समझायेंगे।
भवतु सब्ब मंगलं
स्वामी डॉ बोधी आनंद
जय भूमि नमो भारत🇮🇳
Copy🇮🇳 paste 🇮🇳share
*लंका सारी जल गई गए निशाचर भाग*।।
🇮🇳🇮🇳9*4*5🌷🌷🌷🌷💐ब्राह्मण धर्म प्रतीकों व चिन्हों का पुलिंदा है। इन मूर्तियो व तस्वीर रूपी प्रतीकों मे छुपे बुद्धिज्म को हासिल कर ब्राह्मण धर्म को *हजम* करना बहुत आसान है।
मगर आप है क़ि उन्ही झूठे प्रतीक चिन्हों व कहानियों की उधेड़ बुन मे लगे हैं जो मूर्खो से अपनी बात मनवाने के लिए exaggerate (मट्ठा बढ़ाना) की गयी हैं।
ये मट्ठा बढ़ाना ही तो है जब कहा जाता है क़ि *हनुमान की पूँछ मे लगन न पाई आग। लंका सारी जल गई गए निशाचर भाग*। ये भाषा शैली अलंकारित भाषा शैली है। जिसे सुन कर अविवेकी व नासमझ इन्शान तुरंत नतमस्तक हो जाता है। उसके मन मे तुरन्त विचार आता है *अरे साला पुंछ मे आग लगी ही नही और पूरी लंका जल भी गयी। वाह क्या बात है😱*।
जो लेखक व वक्ता की बात को प्रभावी ढंग से communicate कर देती है। क्योंकि अंतिम उद्देश्य *अपनी बात दूसरों को स्वीकार कराना होता है। फिर चाहे वह तर्क व विज्ञान से समझाओ या अलंकारित कहानियो या भाषा शैली से।*
उम्मीद है क़ि इतनी simple बात आप स्वयं समझेगे व दूसरों को भी समझायेंगे।
भवतु सब्ब मंगलं
स्वामी डॉ बोधी आनंद
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