गुरुपूर्णिमा धम्मचक्क पवत्तन, अनंत उल्लास चक्र-पाणि हेतु अनित्यबोध धम्मयात्रा असीम सुखों की खान - मर्मस्पर्शी आलोककथा।
*गुरुपूर्णिमा धम्मचक्क पवत्तन, अनंत उल्लास चक्र-पाणि हेतु अनित्यबोध धम्मयात्रा असीम सुखों की खान - मर्मस्पर्शी आलोककथा।*
🌷🌷9*4*5☸☸☸☸🇮🇳
किसी का भी अन्त कभी नही होता। यह अंत असल मे अनन्त का हिस्सा मात्र है।
किसी की समाप्ति हमेशा दूसरे विषय की शुरुआत होती है। मगर तृष्णा युक्त लगाव के कारण हम उस अनंत के हिस्से जिसका सानिध्य हमे प्राप्त हुआ, के बंधक हो जाते हैं। इसीलिए किसी भी कार्य का मनमाफिक अंत हमें सुख देता हैं। स्फूर्ति व उल्लास से भर देता हैं जबकि इसी उल्लास व हर्ष का जब अंत मनमाफिक नही होता है तो हम गहरे शोक में डूब जाते हैं। हमें अक्सर ऐसा लगता है कि अब हम कैसे जियेंगे। किसके सहारे जियेंगे?
किसके लिए जियेंगे?
यही दुख कहलाता है।
इसी को लोग स्पर्श नही करना चाहते।
लोग चाहते है हमेशा हर्ष व उल्लासपूर्ण जीवन यात्रा चलती रहे। इसी को हम अक्सर मजा कहते है। इसी में सदा डूबते उतराते रहना हमारा स्वभाव बन गया है ।हम इसी तरह पालना मे पड़े पड़े जीवन चलाना चाहते है।जबकि ऐसा सम्भव नहीं। खासकर भौतिकवादी आवश्यक्ताओं के पूर्ति की जद्दोजहद के कारण तो बिल्कुल ऐसा संभव नहीं है।
*बल्कि हमेशा हर्ष व उल्लास का अहसास इसी उल्लास व हर्ष को ही शोक समझने लगता है।* ऐसे में दुख को कभी भी दुख नही बल्कि एक शुरुआत एक यात्रा का हिस्सा मानकर चलना चाहिए। नवयात्रा हमेशा रोमांचकारी होती है। जिसमे अनजान चुनौतियां से हम अक्सर घबड़ाते रहते है। हमे सुरक्षा की जरूरत महसूस होने लगती है। हम हमेशा एक बच्चे की भांति बिना किसी चुनौती युक्त जीवन के आदि हो चुके है। खासकर शहरी आबादी तो विशेषकर चुनौती विहीन जीवन ही जीवन समझती है।
यही सदा दुखी रहने का रहस्य है। इस प्रकार यह दुख से अवरोध हमे रोजमर्रा के छोटे छोटे काम भी चुनौती मालूम होने लगते हैं। जबको यह कोई चुनौती नही बल्कि चुनौतियों से अवरोध के परिणामस्वरूप नवनिर्मित डर है जो अब चुनौती बना खड़ा है। जो लोग इस law of impermanence को भूल कर भौतिक वस्तु, व्यक्ति, स्थान आदि में सुख महसूस कर रहे हैं। वे तत काल दुखी होने वाले हैं। ऐसा जो लोग जानकर जीवन जीते हैं वे अक्सर सदासुख कहलाते हैं। खुशी का अतिरेक उनके चेहरे से यदा कदा ही दूर होता है। ऐसे लोगों को देख कर अक्सर दुखी इन्शान भी अपना दुख भूल जाते हैं।
ऐसे लोगों को सुनकर व्यक्ति अक्सर शुन्यगामी हो जाते हैं। जिससे एक असीम शांति का संचार होता है। यही असीम शांति हमे रुचिकर व उद्देश्य पूर्ण जीवन जीना सिखाती है।यही असीम शांति अपने दुख को दूसरे के दुख हस्तांतरण कर खुसी खोज लेती है।
यही दूसरे के दुख में दुखी और खुशी में खुश होना हमे इन्शान बनाती है। जिनके सानिध्य में यह अहसास मिलता है, ऐसे लोग अक्सर मार्गदृष्टा व पथप्रदर्शक दोनों ही होते हैं। इसीलिए हम जहां कहीं भी "इति" देखें हमको तुरंत उसमे कृति दिखाई देनी चाहिए। जिसने इस कला को सीख लिया वही आनंद हो जाता है।
जब कभी भी हमे the end समझ आये हमे तुरंत उसे and का प्रारंभ समझना चाहिए। यही जीवन का उसूल व रहस्य है। जो लोग ऐसा नही जानते वे अक्सर दुखी रहते हैं। उन लोगों की मनोदशा एक नई नवेली दुल्हन के समान होती है। जो डोली में बैठी बैठी सपनों का महल खड़ी करती रहती है। बिना यह जाने की हमारे पैरों के नीचे जमीन नही है। हम खुद के पैरों के बल खड़े भी नही हो सकते। इसीलिए तो 4- 4 कहार अपने कंधे पर धरती का बोझ उठाने को मजबूर हुए हैं। मगर दुल्हन को डोली पर बैठा देखना आज भले ही मनोहारी नजर आता है मगर यह उस दुल्हन की अपाहिज अवस्था का द्योतक है। इस सच से परे की सोच परिकथालोक का विचरण भले ही कराती है। बिदाई गीत व माहौल इस परिकथालोक projection में चार चांद लगा देते हैं।
यही कारण है कि जब वही नई नवेली दुल्हन जमीन पर कदम रखती है तो उसे अपनी खयाली हकीकत व जमीनी हकीकत में भारी अंतर नजर आता है। अक्सर शादी संबंध के तत्काल बाद दोनों परिवारों में होने वाले विवाद इसी ख्याली महल के ढहने की दास्तान मात्र होते हैं। जो वर व वधु दोनों पक्षों ने बिना हकीकत को समझे खड़े किए होते हैं। कई बार यह ख्याली महलो का ढहना ही कोर्ट कचहरी व परिवार विच्छेद तक की नौबत ले आता है।
यह बुरे विचार व कर्म बार बार नित नए बुरे कर्मो को जन्म देते हैं। जिस कारण व्यक्ति जीवन पर्यन्त दुख के दुष्चक्र में पिसने को मजबूर होता रहता है।
इस दुष्चक्र को चार चांद विज्ञापन उद्योग, सिनेमा, धारावाहिक, फैशन, आपसी देखा दाखी की तृष्णा लगाती है। जिसे अक्सर इसी दुष्चक्र में फंसे लोग अच्छा व मनमोहक मानते हैं। जो पुनः सपनों के सृजन का काम करता है। इसी स्वप्न लोक को हम अक्सर जीवन या विधि का विधान मान लेते हैं। जबकि हम सब जानते हैं कि सपने कभी अपने नहीं होते। वे ख्यालों के प्रतिबिंब मात्र होते है। मगर दुनियावी लोग इस हकीकत को जीवन भर झुठलाने की कोशिश करते रहते हैं। उनका सारा जीवन केवल एक ही चेष्टा में गुजरता है कि कैसे हम हर्ष व उल्लासपुर्ण जिंदगी गुजारें। बिना यह जाने हुए कि आखिर जिंदगी है क्या।
इस अबोध को सहलाने का काम टोले मुहल्ले वाले, इष्ट मित्र, सखा आदि करते हैं। जो स्वतः एक मनोहारी दृश्य का सृजन करता बनते है। यह ठीक एक लुटे पिटे पशुओं के समूह का एक दूसरे को ढांढस बंधाने जैसा रूपक मात्र है। जिसमे रोते तो सब हैं। जिसमे दुखी तो सब होते हैं। उन्ही में से जो दुख व आँशुओ से आजिज आ चुके होते हैं वे अभी भी यथा दुखियों को तरह तरह की दिलासा दिलाते हैं। बिना यह विश्लेषण की जरूरत समझें कि हम सबकी इतनी भारी संख्या होने के वावजूद भी कुटाई पिटाई क्यों हुई???
क्यों चंद मुट्ठीभर लोग मंदिर के घंटे की भांति हमे बजाकर चले गए???
इस प्रकार ऐसे दीन दुखियों का दुख बारंबार आता रहता है। इसीलिए दुख को चक्राकार माना जाता है।
यह चक्र ही धम्म चक्र है।
यह चक्र ही सुदर्शन चक्र है।
यही चक्र ही कृष्ण के हाथ मे पहुंचने पर परमचक्र बना। यही चक्र, ब्रह्मा के हाथों में पहुंचने पर ब्रह्मास्त्र कहलाया।
यह चक्र ही तथागत बुध्द के हाथों निर्मित, पल्लवित व सिंचित हुआ तो धम्मचक्र कहलाया।
यही चक्र महान सम्राट अशोक के हाथ पहुंचा तो सम्पूर्ण भारत की शान "अशोक चक्र" बन कर आज भी हमे गर्व व गौरव की स्फूर्त से तरोताजा कर रहा है। यही चक्र आज पुनः हमारे हाथ मे है। जिसके भी हाथ यह चक्र सुशोभित हुआ वह चक्रपाणि कहलाया।
आप सभी चक्रपाणि बने। आप सभी महान सम्राट हर्षवर्धन की संतान है। आपका जन्म इस पृथ्वी पर इस चक्र को दुष्चक्र बनाये बैठे लोगों से मुक्ति दिलाने व हर्षपूर्ण पुनः राष्ट्रीय प्रतीक की प्रस्थापना हेतु हुआ है। आपकी जीवन यात्रा के तमाम पड़ाव हो सकते हैं मगर उद्देश्य "1" ही हो सकता है। सबका मालिक "1" है।
ऐसा सारा अनर्थ केवल भगवान बुध्द के अनित्य के सिद्धांत की अवहेलना या नासमझी के कारण होता है।
इसीलिए आइये इस नासमझी को दूर कर अपने अपने हृदय में धम्मज्योति का प्रज्ज्वलन करें। यह धम्मज्योति विंध्य, हिमाचल, उत्कल, बंग बन उज्ज्वल जलज तरंग बन उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम आदि सम्पूर्ण विश्व मे प्रज्जवलित हो। सभी प्राणी इस दुष्चक्र से मुक्त होकर चक्रपाणि बने। सभी के जीवन में प्रकाश हो । सभी सुखी हों।
जयययय हे जय हेययय।
जय जय जय जय हो।
भवतु सब्ब मंगलं।💐💐
जय भारत भूमि🇮🇳
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किसी का भी अन्त कभी नही होता। यह अंत असल मे अनन्त का हिस्सा मात्र है।
किसी की समाप्ति हमेशा दूसरे विषय की शुरुआत होती है। मगर तृष्णा युक्त लगाव के कारण हम उस अनंत के हिस्से जिसका सानिध्य हमे प्राप्त हुआ, के बंधक हो जाते हैं। इसीलिए किसी भी कार्य का मनमाफिक अंत हमें सुख देता हैं। स्फूर्ति व उल्लास से भर देता हैं जबकि इसी उल्लास व हर्ष का जब अंत मनमाफिक नही होता है तो हम गहरे शोक में डूब जाते हैं। हमें अक्सर ऐसा लगता है कि अब हम कैसे जियेंगे। किसके सहारे जियेंगे?
किसके लिए जियेंगे?
यही दुख कहलाता है।
इसी को लोग स्पर्श नही करना चाहते।
लोग चाहते है हमेशा हर्ष व उल्लासपूर्ण जीवन यात्रा चलती रहे। इसी को हम अक्सर मजा कहते है। इसी में सदा डूबते उतराते रहना हमारा स्वभाव बन गया है ।हम इसी तरह पालना मे पड़े पड़े जीवन चलाना चाहते है।जबकि ऐसा सम्भव नहीं। खासकर भौतिकवादी आवश्यक्ताओं के पूर्ति की जद्दोजहद के कारण तो बिल्कुल ऐसा संभव नहीं है।
*बल्कि हमेशा हर्ष व उल्लास का अहसास इसी उल्लास व हर्ष को ही शोक समझने लगता है।* ऐसे में दुख को कभी भी दुख नही बल्कि एक शुरुआत एक यात्रा का हिस्सा मानकर चलना चाहिए। नवयात्रा हमेशा रोमांचकारी होती है। जिसमे अनजान चुनौतियां से हम अक्सर घबड़ाते रहते है। हमे सुरक्षा की जरूरत महसूस होने लगती है। हम हमेशा एक बच्चे की भांति बिना किसी चुनौती युक्त जीवन के आदि हो चुके है। खासकर शहरी आबादी तो विशेषकर चुनौती विहीन जीवन ही जीवन समझती है।
यही सदा दुखी रहने का रहस्य है। इस प्रकार यह दुख से अवरोध हमे रोजमर्रा के छोटे छोटे काम भी चुनौती मालूम होने लगते हैं। जबको यह कोई चुनौती नही बल्कि चुनौतियों से अवरोध के परिणामस्वरूप नवनिर्मित डर है जो अब चुनौती बना खड़ा है। जो लोग इस law of impermanence को भूल कर भौतिक वस्तु, व्यक्ति, स्थान आदि में सुख महसूस कर रहे हैं। वे तत काल दुखी होने वाले हैं। ऐसा जो लोग जानकर जीवन जीते हैं वे अक्सर सदासुख कहलाते हैं। खुशी का अतिरेक उनके चेहरे से यदा कदा ही दूर होता है। ऐसे लोगों को देख कर अक्सर दुखी इन्शान भी अपना दुख भूल जाते हैं।
ऐसे लोगों को सुनकर व्यक्ति अक्सर शुन्यगामी हो जाते हैं। जिससे एक असीम शांति का संचार होता है। यही असीम शांति हमे रुचिकर व उद्देश्य पूर्ण जीवन जीना सिखाती है।यही असीम शांति अपने दुख को दूसरे के दुख हस्तांतरण कर खुसी खोज लेती है।
यही दूसरे के दुख में दुखी और खुशी में खुश होना हमे इन्शान बनाती है। जिनके सानिध्य में यह अहसास मिलता है, ऐसे लोग अक्सर मार्गदृष्टा व पथप्रदर्शक दोनों ही होते हैं। इसीलिए हम जहां कहीं भी "इति" देखें हमको तुरंत उसमे कृति दिखाई देनी चाहिए। जिसने इस कला को सीख लिया वही आनंद हो जाता है।
जब कभी भी हमे the end समझ आये हमे तुरंत उसे and का प्रारंभ समझना चाहिए। यही जीवन का उसूल व रहस्य है। जो लोग ऐसा नही जानते वे अक्सर दुखी रहते हैं। उन लोगों की मनोदशा एक नई नवेली दुल्हन के समान होती है। जो डोली में बैठी बैठी सपनों का महल खड़ी करती रहती है। बिना यह जाने की हमारे पैरों के नीचे जमीन नही है। हम खुद के पैरों के बल खड़े भी नही हो सकते। इसीलिए तो 4- 4 कहार अपने कंधे पर धरती का बोझ उठाने को मजबूर हुए हैं। मगर दुल्हन को डोली पर बैठा देखना आज भले ही मनोहारी नजर आता है मगर यह उस दुल्हन की अपाहिज अवस्था का द्योतक है। इस सच से परे की सोच परिकथालोक का विचरण भले ही कराती है। बिदाई गीत व माहौल इस परिकथालोक projection में चार चांद लगा देते हैं।
यही कारण है कि जब वही नई नवेली दुल्हन जमीन पर कदम रखती है तो उसे अपनी खयाली हकीकत व जमीनी हकीकत में भारी अंतर नजर आता है। अक्सर शादी संबंध के तत्काल बाद दोनों परिवारों में होने वाले विवाद इसी ख्याली महल के ढहने की दास्तान मात्र होते हैं। जो वर व वधु दोनों पक्षों ने बिना हकीकत को समझे खड़े किए होते हैं। कई बार यह ख्याली महलो का ढहना ही कोर्ट कचहरी व परिवार विच्छेद तक की नौबत ले आता है।
यह बुरे विचार व कर्म बार बार नित नए बुरे कर्मो को जन्म देते हैं। जिस कारण व्यक्ति जीवन पर्यन्त दुख के दुष्चक्र में पिसने को मजबूर होता रहता है।
इस दुष्चक्र को चार चांद विज्ञापन उद्योग, सिनेमा, धारावाहिक, फैशन, आपसी देखा दाखी की तृष्णा लगाती है। जिसे अक्सर इसी दुष्चक्र में फंसे लोग अच्छा व मनमोहक मानते हैं। जो पुनः सपनों के सृजन का काम करता है। इसी स्वप्न लोक को हम अक्सर जीवन या विधि का विधान मान लेते हैं। जबकि हम सब जानते हैं कि सपने कभी अपने नहीं होते। वे ख्यालों के प्रतिबिंब मात्र होते है। मगर दुनियावी लोग इस हकीकत को जीवन भर झुठलाने की कोशिश करते रहते हैं। उनका सारा जीवन केवल एक ही चेष्टा में गुजरता है कि कैसे हम हर्ष व उल्लासपुर्ण जिंदगी गुजारें। बिना यह जाने हुए कि आखिर जिंदगी है क्या।
इस अबोध को सहलाने का काम टोले मुहल्ले वाले, इष्ट मित्र, सखा आदि करते हैं। जो स्वतः एक मनोहारी दृश्य का सृजन करता बनते है। यह ठीक एक लुटे पिटे पशुओं के समूह का एक दूसरे को ढांढस बंधाने जैसा रूपक मात्र है। जिसमे रोते तो सब हैं। जिसमे दुखी तो सब होते हैं। उन्ही में से जो दुख व आँशुओ से आजिज आ चुके होते हैं वे अभी भी यथा दुखियों को तरह तरह की दिलासा दिलाते हैं। बिना यह विश्लेषण की जरूरत समझें कि हम सबकी इतनी भारी संख्या होने के वावजूद भी कुटाई पिटाई क्यों हुई???
क्यों चंद मुट्ठीभर लोग मंदिर के घंटे की भांति हमे बजाकर चले गए???
इस प्रकार ऐसे दीन दुखियों का दुख बारंबार आता रहता है। इसीलिए दुख को चक्राकार माना जाता है।
यह चक्र ही धम्म चक्र है।
यह चक्र ही सुदर्शन चक्र है।
यही चक्र ही कृष्ण के हाथ मे पहुंचने पर परमचक्र बना। यही चक्र, ब्रह्मा के हाथों में पहुंचने पर ब्रह्मास्त्र कहलाया।
यह चक्र ही तथागत बुध्द के हाथों निर्मित, पल्लवित व सिंचित हुआ तो धम्मचक्र कहलाया।
यही चक्र महान सम्राट अशोक के हाथ पहुंचा तो सम्पूर्ण भारत की शान "अशोक चक्र" बन कर आज भी हमे गर्व व गौरव की स्फूर्त से तरोताजा कर रहा है। यही चक्र आज पुनः हमारे हाथ मे है। जिसके भी हाथ यह चक्र सुशोभित हुआ वह चक्रपाणि कहलाया।
आप सभी चक्रपाणि बने। आप सभी महान सम्राट हर्षवर्धन की संतान है। आपका जन्म इस पृथ्वी पर इस चक्र को दुष्चक्र बनाये बैठे लोगों से मुक्ति दिलाने व हर्षपूर्ण पुनः राष्ट्रीय प्रतीक की प्रस्थापना हेतु हुआ है। आपकी जीवन यात्रा के तमाम पड़ाव हो सकते हैं मगर उद्देश्य "1" ही हो सकता है। सबका मालिक "1" है।
ऐसा सारा अनर्थ केवल भगवान बुध्द के अनित्य के सिद्धांत की अवहेलना या नासमझी के कारण होता है।
इसीलिए आइये इस नासमझी को दूर कर अपने अपने हृदय में धम्मज्योति का प्रज्ज्वलन करें। यह धम्मज्योति विंध्य, हिमाचल, उत्कल, बंग बन उज्ज्वल जलज तरंग बन उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम आदि सम्पूर्ण विश्व मे प्रज्जवलित हो। सभी प्राणी इस दुष्चक्र से मुक्त होकर चक्रपाणि बने। सभी के जीवन में प्रकाश हो । सभी सुखी हों।
जयययय हे जय हेययय।
जय जय जय जय हो।
भवतु सब्ब मंगलं।💐💐
जय भारत भूमि🇮🇳
कॉपी पेस्ट शेयर💐💐
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