*राष्ट्रीय शोक भी बना जातिआधारित दलगत राजनीति का शिकार।*
वेतन आयोग द्वारा सन 1997 में एक सिफारिश की गई थी कि देश का कोई भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री आदि महानुभाव की मृत्यु होने पर राष्ट्रीय अवकाश तभी घोषित किया जाएगा जब वह व्यक्ति वर्तमान में भी कार्यरत हो। इसी आदेश की छत्रछाया में पूर्व राष्ट्रपति श्रद्धेय के आर नारायनन जी, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह जी, पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा, जीएमसी बालयोगी, राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव आदि की मृत्यु पर देश में कोई भी राष्ट्रीय अवकाश घोषित नहीं किया गया।
जबकि अभी जब पूर्व प्रधानमंत्री पंडित अटल अटल बिहारी वाजपेई की मौत हुई तो देश में संघी भाजपाई सरकारों ने 1 दिन का पूर्णकालिक अवकाश घोषित किया गया। साथ ही 7 दिन का राष्ट्रीय शोक भी।
यह तर्क कहां तक सही है कि 1997 के आदेश के रहते हुए यदि कोई भाजपाई नेता मरे तो राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया जाए????
जबकि यही सत्ताधारी लोग तमाम महापुरुषों की जयंतियां व मृत्यु दिवस अवकाशों को खारिज कर खानापूर्ति का आदेश भी जारी कर चुके हैं। इसका पहला शिकार डॉक्टर बाबासाहेब अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस जयंती की गई। पैगंबर मोहम्मद साहब संत रविदास जयंती इत्यादि के उपलक्ष में होने वाले अवकाशों को विभिन्न सरकारों ने खारिज कर कार्य दिवस घोषित किया।
क्या आपको नहीं लगता है कि आज भाजपाई नेता राष्ट्रीय शोक को भी दलगत व जातिगत राजनीति के शिकार बनाये जा रहे हैं।
यह कहां तक सही है कि जिस 1997 के आदेश के अनुपालन में गणमान्य नागरिकों की मृत्यु होने पर कोई शौक घोषित नहीं किया गया जबकि पंडित अटल बिहारी वाजपेई की मौत पर 1 दिन का पूर्ण अवकाश के साथ 7 दिन का राष्ट्रीय शोक डिक्लेयर किया गया।
क्या इसमें आपको जाति की बू नहीं आती है ?????
क्या इसमें आपको दलगत राजनीति की बू नहीं आती है???
क्या इस तरह की मानसिकता लिए बैठे राजनेताओं से देश के सभी नागरिकों के भलाई की उम्मीद की जा सकती है????
फिर आप बेगानी शादी में क्यों दीवाने हो...?
आने वाले समय में क्या यह सवाल नहीं उठेगा कि जब पंडित अटल बिहारी वाजपेई की मौत पर 1 दिन का पूर्ण कालीन अवकाश घोषित किया जा सकता है तो अन्य नेताओं की मौत पर यह शोक क्यों नहीं घोषित किया जाए।।।।
ऐसी मांग क्यों नहीं उठेगी।
क्या देश कानून से चलेगा या तुलसीदास की समरथ को नहिं दोष गुसाईं चौपाइयों के आधार पर।
यदि देश तुलसीदास की चौपाइयों के आधार पर चलने लगे तो समझना चाहिए कि देश में लोकतंत्र खत्म हो चुका है, इसके बावजूद यदि सत्ताधारी लोग यदि लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटते हैं तो उन से बड़ा कोई लोकतंत्र का हत्यारा नहीं हो सकता।
देश के तमाम सत्ताच्युत लोगों को पंडित अटल बिहारी वाजपेई की मौत और 1 दिन का राष्ट्रीय शोक अवकाश के उदाहरण को गांठ बांध के रख लेना चाहिए।।।
अन्यथा देश संविधान या कानून से नहीं "जिसकी लाठी उसकी भैंस से चलेगा" ।।
जय भारत भूमि 🇮🇳🇮🇳
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वेतन आयोग द्वारा सन 1997 में एक सिफारिश की गई थी कि देश का कोई भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री आदि महानुभाव की मृत्यु होने पर राष्ट्रीय अवकाश तभी घोषित किया जाएगा जब वह व्यक्ति वर्तमान में भी कार्यरत हो। इसी आदेश की छत्रछाया में पूर्व राष्ट्रपति श्रद्धेय के आर नारायनन जी, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह जी, पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा, जीएमसी बालयोगी, राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव आदि की मृत्यु पर देश में कोई भी राष्ट्रीय अवकाश घोषित नहीं किया गया।
जबकि अभी जब पूर्व प्रधानमंत्री पंडित अटल अटल बिहारी वाजपेई की मौत हुई तो देश में संघी भाजपाई सरकारों ने 1 दिन का पूर्णकालिक अवकाश घोषित किया गया। साथ ही 7 दिन का राष्ट्रीय शोक भी।
यह तर्क कहां तक सही है कि 1997 के आदेश के रहते हुए यदि कोई भाजपाई नेता मरे तो राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया जाए????
जबकि यही सत्ताधारी लोग तमाम महापुरुषों की जयंतियां व मृत्यु दिवस अवकाशों को खारिज कर खानापूर्ति का आदेश भी जारी कर चुके हैं। इसका पहला शिकार डॉक्टर बाबासाहेब अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस जयंती की गई। पैगंबर मोहम्मद साहब संत रविदास जयंती इत्यादि के उपलक्ष में होने वाले अवकाशों को विभिन्न सरकारों ने खारिज कर कार्य दिवस घोषित किया।
क्या आपको नहीं लगता है कि आज भाजपाई नेता राष्ट्रीय शोक को भी दलगत व जातिगत राजनीति के शिकार बनाये जा रहे हैं।
यह कहां तक सही है कि जिस 1997 के आदेश के अनुपालन में गणमान्य नागरिकों की मृत्यु होने पर कोई शौक घोषित नहीं किया गया जबकि पंडित अटल बिहारी वाजपेई की मौत पर 1 दिन का पूर्ण अवकाश के साथ 7 दिन का राष्ट्रीय शोक डिक्लेयर किया गया।
क्या इसमें आपको जाति की बू नहीं आती है ?????
क्या इसमें आपको दलगत राजनीति की बू नहीं आती है???
क्या इस तरह की मानसिकता लिए बैठे राजनेताओं से देश के सभी नागरिकों के भलाई की उम्मीद की जा सकती है????
फिर आप बेगानी शादी में क्यों दीवाने हो...?
आने वाले समय में क्या यह सवाल नहीं उठेगा कि जब पंडित अटल बिहारी वाजपेई की मौत पर 1 दिन का पूर्ण कालीन अवकाश घोषित किया जा सकता है तो अन्य नेताओं की मौत पर यह शोक क्यों नहीं घोषित किया जाए।।।।
ऐसी मांग क्यों नहीं उठेगी।
क्या देश कानून से चलेगा या तुलसीदास की समरथ को नहिं दोष गुसाईं चौपाइयों के आधार पर।
यदि देश तुलसीदास की चौपाइयों के आधार पर चलने लगे तो समझना चाहिए कि देश में लोकतंत्र खत्म हो चुका है, इसके बावजूद यदि सत्ताधारी लोग यदि लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटते हैं तो उन से बड़ा कोई लोकतंत्र का हत्यारा नहीं हो सकता।
देश के तमाम सत्ताच्युत लोगों को पंडित अटल बिहारी वाजपेई की मौत और 1 दिन का राष्ट्रीय शोक अवकाश के उदाहरण को गांठ बांध के रख लेना चाहिए।।।
अन्यथा देश संविधान या कानून से नहीं "जिसकी लाठी उसकी भैंस से चलेगा" ।।
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