*भारत का तीसरा हिस्सा- हकमारी, मुंशीगीरी की इन्तेहाँ।*
🌷🌷9*4*5☸☸☸☸🇮🇳
Freedom at midnight के लेखक डोमिनिक लैपिरे और लैरी कोलिन्स लिखते है कि भारत के अंतिम गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन जब भारत आये तब उन्होंने ब्रिटिश राजघराने से लिखित में वादा कराया था कि हम भारत मे जो भी फैसला करेंगे वह अंतिम होगा। उसमे ब्रिटिश राजघराना कोई दखलंदाजी नही करेगा।
इसीलिए कैबिनेट मिशन आने तक जो अंग्रेज यह कहते थे कि भारत का अगर कभी विभाजन हुआ तो उसके दो नहीं बल्कि 3 हिस्से होंगे, जिसमे से एक हिन्दुओ के लिए दूसरा मुसलमानों के लिए और तीसरा अछूतों के लिए होगा। सन 1946 तक यह अंग्रेजो का लिखित stand था।
मगर जैसा कि india wins freedom में मौलाना आजाद लिखते हैं कि मैं यह जानकर हैरान हो गया कि जो गांधी जी यह घोषणा किये थे कि भारत का यदि विभाजन हुआ तो वह मेरी लाश पर गुजरकर ही होगा। वही मोहनदास गांधी AICC (all india congress committee) की बैठक की अध्यक्षता में स्वयं भारत के दो टुकड़ों की मंजूरी देकर आ गया।
जिसको अंग्रेजों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
*मगर इस चाल से गांधी और कांग्रेस ने डॉ अंबेडकर को स्वीकृति भारत का तीसरा हिस्सा गायब कर दिया।*
भक्तो बोलिये
वैष्णव जन तो तेने कहिये, पीर पराई जाने रे.......
यह जानकर डॉ अम्बेडकर तुरंत लन्दन जाकर प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली, विंस्टन चर्चिल आदि से मिले। मगर नतीजा शून्य ही रहा। सबने अपने अपने हाथ खड़े कर दिए। उसी समय डोमिनिक लैपिरे और लैरी कोलिन्स की लिखी बात प्रमाणीत हुई।
बाद में डॉ अम्बेडकर खिसियानी बिल्ली खम्मा नोंचे वाली हालत में मुंह लटकाए वापस भारत आ गए।
जाहिर सी बात है कि भारत के बहुसंख्य नागरिकों की हकमारी मोहनदास गांधी और कांग्रेस द्वारा की जा चुकी थी।
यह यह खिसियानी बिल्ली बाकई में यदि खम्मा नोंचना न शुरू कर दे इसी खतरे को भांपते हुए ही गांधी और उनकी कांग्रेस ने सडयंत्र पूर्वक डॉ अम्बेडकर को संविधान लिखने की मुंशीगिरी प्रदान की।
ताकि यदि डॉ अम्बेडकर इसी प्रकार स्वतंत्र रहकर काम करते रहे तो पुनः संकट खड़ा कर सकते हैं।
मगर आज के रतौंधी ग्रस्त झामसेफी अम्बेडकर वादी आज भी उसी संविधान में डॉ अंबेडकर के योगदान को लेकर आह्लादित होते रहते हैं।
जिस कांग्रेस ने बहुसंख्यक भारत वासियों का हक छीन लिया। आज वही बहुसंख्यक बहुजन लोग पुनः कांग्रेसमय होने को बेताब हैं।
जिस मुंशीगिरी ने भारतीय संघ में बहुसंख्य भारत की हिस्सेदारी सुनिश्चित की, आज पुनः अल्पसंख्य लोग बहुसंख्य की हिस्सेमारी में लगे हैं।
ऐसे में आपको अपनी भारत से हिस्सेमारी हटा लेनी चाहिए या नहीं???
85% योगदान तो आपका ही है स्वयं के विरोधियों को मजबूत करने में। हटा लीजिए उसे।
मगर बहुसंख्य भारत आज भी दीमक की भांति खाने निकालने में लगा हुआ है।
इसीलिए जब तक मुंशीजी और उनकी मुंशीगिरी का गुणगान होता रहेगा बहुसंख्यक लोगों की '"हिस्सेमारी" जारी रहेगी।
*इसलिए डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर के व्यक्तित्व व कृतित्व का गुणगान करना बंद कीजिए।*
यह पराजितों की फौज जब तक डॉ आंबेडकर के भजन कीर्तन में लगी रहेगी तब तक बहुजनों की हकमारी जारी रहेगी। अल्पसंख्यक वर्ग मजबूत होता रहेगा।
अम्बेडकर वाद के चंगुल से बाहर निकलिए बुध्दवाद की शरण चलिये।
भवतु सब्ब मंगलं।☸
स्वामी डॉ बोधी आनंद
जय भारत भूमि🇮🇳
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🌷🌷9*4*5☸☸☸☸🇮🇳
Freedom at midnight के लेखक डोमिनिक लैपिरे और लैरी कोलिन्स लिखते है कि भारत के अंतिम गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन जब भारत आये तब उन्होंने ब्रिटिश राजघराने से लिखित में वादा कराया था कि हम भारत मे जो भी फैसला करेंगे वह अंतिम होगा। उसमे ब्रिटिश राजघराना कोई दखलंदाजी नही करेगा।
इसीलिए कैबिनेट मिशन आने तक जो अंग्रेज यह कहते थे कि भारत का अगर कभी विभाजन हुआ तो उसके दो नहीं बल्कि 3 हिस्से होंगे, जिसमे से एक हिन्दुओ के लिए दूसरा मुसलमानों के लिए और तीसरा अछूतों के लिए होगा। सन 1946 तक यह अंग्रेजो का लिखित stand था।
मगर जैसा कि india wins freedom में मौलाना आजाद लिखते हैं कि मैं यह जानकर हैरान हो गया कि जो गांधी जी यह घोषणा किये थे कि भारत का यदि विभाजन हुआ तो वह मेरी लाश पर गुजरकर ही होगा। वही मोहनदास गांधी AICC (all india congress committee) की बैठक की अध्यक्षता में स्वयं भारत के दो टुकड़ों की मंजूरी देकर आ गया।
जिसको अंग्रेजों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
*मगर इस चाल से गांधी और कांग्रेस ने डॉ अंबेडकर को स्वीकृति भारत का तीसरा हिस्सा गायब कर दिया।*
भक्तो बोलिये
वैष्णव जन तो तेने कहिये, पीर पराई जाने रे.......
यह जानकर डॉ अम्बेडकर तुरंत लन्दन जाकर प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली, विंस्टन चर्चिल आदि से मिले। मगर नतीजा शून्य ही रहा। सबने अपने अपने हाथ खड़े कर दिए। उसी समय डोमिनिक लैपिरे और लैरी कोलिन्स की लिखी बात प्रमाणीत हुई।
बाद में डॉ अम्बेडकर खिसियानी बिल्ली खम्मा नोंचे वाली हालत में मुंह लटकाए वापस भारत आ गए।
जाहिर सी बात है कि भारत के बहुसंख्य नागरिकों की हकमारी मोहनदास गांधी और कांग्रेस द्वारा की जा चुकी थी।
यह यह खिसियानी बिल्ली बाकई में यदि खम्मा नोंचना न शुरू कर दे इसी खतरे को भांपते हुए ही गांधी और उनकी कांग्रेस ने सडयंत्र पूर्वक डॉ अम्बेडकर को संविधान लिखने की मुंशीगिरी प्रदान की।
ताकि यदि डॉ अम्बेडकर इसी प्रकार स्वतंत्र रहकर काम करते रहे तो पुनः संकट खड़ा कर सकते हैं।
मगर आज के रतौंधी ग्रस्त झामसेफी अम्बेडकर वादी आज भी उसी संविधान में डॉ अंबेडकर के योगदान को लेकर आह्लादित होते रहते हैं।
जिस कांग्रेस ने बहुसंख्यक भारत वासियों का हक छीन लिया। आज वही बहुसंख्यक बहुजन लोग पुनः कांग्रेसमय होने को बेताब हैं।
जिस मुंशीगिरी ने भारतीय संघ में बहुसंख्य भारत की हिस्सेदारी सुनिश्चित की, आज पुनः अल्पसंख्य लोग बहुसंख्य की हिस्सेमारी में लगे हैं।
ऐसे में आपको अपनी भारत से हिस्सेमारी हटा लेनी चाहिए या नहीं???
85% योगदान तो आपका ही है स्वयं के विरोधियों को मजबूत करने में। हटा लीजिए उसे।
मगर बहुसंख्य भारत आज भी दीमक की भांति खाने निकालने में लगा हुआ है।
इसीलिए जब तक मुंशीजी और उनकी मुंशीगिरी का गुणगान होता रहेगा बहुसंख्यक लोगों की '"हिस्सेमारी" जारी रहेगी।
*इसलिए डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर के व्यक्तित्व व कृतित्व का गुणगान करना बंद कीजिए।*
यह पराजितों की फौज जब तक डॉ आंबेडकर के भजन कीर्तन में लगी रहेगी तब तक बहुजनों की हकमारी जारी रहेगी। अल्पसंख्यक वर्ग मजबूत होता रहेगा।
अम्बेडकर वाद के चंगुल से बाहर निकलिए बुध्दवाद की शरण चलिये।
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स्वामी डॉ बोधी आनंद
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