क्या बहुजन समाज के ज्यादातर लोग संत कबीर साहेब की "समाधी" मे लीन हैं-एक विश्लेषण
🇮🇳🇮🇳9*4*5✍✍✍✍✍
विश्व शिरोमणि संत कबीर साहेब जी कहते हैं क़ि~
👇~संतो सहज समाधी भली।
साधु से मिलन भयो, जा दिन ते सूरत न अंत चली।।
👇~आँख न मुँदू, कान न रूंधू काया कष्ट न धारूँ।
खुले नैन से हँस हँस देखूँ, सुंदर रूप निहारूँ।।
👇~कहूँ सो नाम, सुनूँ सो सुमिरन, जो कुछ करूँ सो पूजा।
गिरह उधान एक सम देखूँ भाव मिटाऊँ दूजा।।
👇~जहाँ जहाँ जाऊँ सोइ परिकरमा, जो कुछ करूँ सो सेवा।
जब सोऊँ तब करूँ दण्डवत, पूजूँ और न देवा।।
👇~शब्द निरंतर मनुआ रटा, मलिन वचन का त्यागी।
उठत बैठत कबहुँ न बिसरे, ऐसी तारी लागी।
👇~कहें कबीर यह उनमनि रहनी, सो परगट कर गाई।
सुख दुख के इक परे, परम सुख, तेहि मे रहा समाई।।
ऐसी है हमारे संतो की समाधी। जो भी करते हैं
जो भी कहते हैं
जो भी सुनते हैं
जो भी सोचते हैं
जो भी बोलते हैं
सब कार्यो मे इतना लीन हो जाते क़ि स्वयं समाधी लग जाती। कुछ अलग से करने की जरूरत ही नही रहती। अक्सर ब्राह्मण सवर्ण पाखंडी लोग मरने के बाद या जिंदा ही जमीन मे अस्थाई या स्थायी रूप से दफन हो जाने को ही समाधि कह कर बदनाम करते रहे हैं।
वाह महान विचारको के अमृत वचन🎻🎷🎺
साहेयययब बंदगी
अब सवाल ये उठता है क़ि
क्या आज भी बहुजन समाज के ज्यादातर लोग समाधिस्ट नहीं हैं??? क्योंकि ये प्रतिक्रिया विहीन होते हुए सहनशीलता की जीती जागती तस्वीर हैं।
क्या आज भी बहुजन समाज के ज्यादातर लोग "अचेतन" अवस्था मे नहीं जी रहे???
क्या इसीलिए इनकी चाहे बहन, बेटी, पत्नी का बलात्कार हो जाये या कोई बहुजन पुरुष मंदिर के घंटे की तरह से बजा दिया जाये लेकिन फिर भी इनमे विद्रोह की भावना नही जागती????
🌷🌷9*4*5🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
क्योंकि बाइबिल कहती है क़ि जो लोग गरीब हैं वो लोग खुदा के उतने ही करीब हैं। अर्थात गरीब रहना खुदा, भगवान /ईश्वर को पाने का सबसे सस्ता व आसान उपाय है। तो बहुसंख्य समाज की गरीबी लाचारी भुखमरी का दोषी कौन है, बाइबिल या ईश्वर या भगवान खुदा या इस तरह के विचार अथवा गरीब बहुजनो का समाधिस्ट होना???!
जय जयय भीम
जय मूलनिवासी
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विश्व शिरोमणि संत कबीर साहेब जी कहते हैं क़ि~
👇~संतो सहज समाधी भली।
साधु से मिलन भयो, जा दिन ते सूरत न अंत चली।।
👇~आँख न मुँदू, कान न रूंधू काया कष्ट न धारूँ।
खुले नैन से हँस हँस देखूँ, सुंदर रूप निहारूँ।।
👇~कहूँ सो नाम, सुनूँ सो सुमिरन, जो कुछ करूँ सो पूजा।
गिरह उधान एक सम देखूँ भाव मिटाऊँ दूजा।।
👇~जहाँ जहाँ जाऊँ सोइ परिकरमा, जो कुछ करूँ सो सेवा।
जब सोऊँ तब करूँ दण्डवत, पूजूँ और न देवा।।
👇~शब्द निरंतर मनुआ रटा, मलिन वचन का त्यागी।
उठत बैठत कबहुँ न बिसरे, ऐसी तारी लागी।
👇~कहें कबीर यह उनमनि रहनी, सो परगट कर गाई।
सुख दुख के इक परे, परम सुख, तेहि मे रहा समाई।।
ऐसी है हमारे संतो की समाधी। जो भी करते हैं
जो भी कहते हैं
जो भी सुनते हैं
जो भी सोचते हैं
जो भी बोलते हैं
सब कार्यो मे इतना लीन हो जाते क़ि स्वयं समाधी लग जाती। कुछ अलग से करने की जरूरत ही नही रहती। अक्सर ब्राह्मण सवर्ण पाखंडी लोग मरने के बाद या जिंदा ही जमीन मे अस्थाई या स्थायी रूप से दफन हो जाने को ही समाधि कह कर बदनाम करते रहे हैं।
वाह महान विचारको के अमृत वचन🎻🎷🎺
साहेयययब बंदगी
अब सवाल ये उठता है क़ि
क्या आज भी बहुजन समाज के ज्यादातर लोग समाधिस्ट नहीं हैं??? क्योंकि ये प्रतिक्रिया विहीन होते हुए सहनशीलता की जीती जागती तस्वीर हैं।
क्या आज भी बहुजन समाज के ज्यादातर लोग "अचेतन" अवस्था मे नहीं जी रहे???
क्या इसीलिए इनकी चाहे बहन, बेटी, पत्नी का बलात्कार हो जाये या कोई बहुजन पुरुष मंदिर के घंटे की तरह से बजा दिया जाये लेकिन फिर भी इनमे विद्रोह की भावना नही जागती????
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क्योंकि बाइबिल कहती है क़ि जो लोग गरीब हैं वो लोग खुदा के उतने ही करीब हैं। अर्थात गरीब रहना खुदा, भगवान /ईश्वर को पाने का सबसे सस्ता व आसान उपाय है। तो बहुसंख्य समाज की गरीबी लाचारी भुखमरी का दोषी कौन है, बाइबिल या ईश्वर या भगवान खुदा या इस तरह के विचार अथवा गरीब बहुजनो का समाधिस्ट होना???!
जय जयय भीम
जय मूलनिवासी
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