क्या महिलाओ व शुद्र अछूत पिछड़ों का मंदिर, मस्जिद या दरगाह मे प्रवेश होना चाहिए- एक दृष्टिकोण??????
🇮🇳🇮🇳9*4*5💐💐💐💐💐
अक्सर ये देखा गया है क़ि विभिन्न धर्मो के लोग अपने अपने धर्म स्थलों मे रोज जाना चाहते है। जबकि यह बात दुनिया को पता है क़ि किसी भी धर्म स्थल मे भगवान ईश्वर अल्लाह आदि का निवास नहीं है। फिर भी उसमे प्रवेश पर रोक व घुसने की जद्दोजहद क्यों?
क्या कबीर साहेब ने इसीलिए कहा था क़ि
न मैं मन्दिर, न मैं मस्जिद, न काबे कैलास मे।
खोजी होय तो तुरत ही मिलये पल भर की तलास मे।।
यदि समानता की दृष्टि से देखा जाये तो धर्म स्थल प्रवेश की मांग कुछ हद तक जायज प्रतीत होती है। लेकिन जब यह बात पता है क़ि ईश्वर भगवान मौला का निवास कथित इन्शान निर्मित धर्म स्थल नहीं है फिर भी उसके लिए संघर्ष समझ से परे है।
अक्सर लोग धर्म स्थल जाते ही क्यों है??????
इस संदर्भ मे देखा गया है क़ि धर्म स्थल जाने वाले लोग दो श्रेणी के होते हैं-
एक वो जो पूजा के नाम पर झूठी उम्मीद या कथित भगवान की चमचागीरी के लिए जाते हैं।
दूसरे वो जो नयनसुख व छेड़खानी के लिए जाते हैं। कभी कहा जाता था क़ि मैं तुमसे मिलने आई मंदिर जाने के बहाने। आज वह जगह बदल कर मन्दिर के स्थान पर कोचिंग सेंटर हो गए हैं।
ऐसे मे जब क़ि यह पता है क़ि इन्शान ने बनाए कथित धर्म स्थल मे कोई भगवान नही है तो फिर किसी भी प्रकार की उम्मीद उस पत्थर के घर से रखना मूर्खता के सिवाय कुछ नही है। जो भी उम्मीद पूरी होती है वह इंशान के स्वयं के मौलिक क्रिया कलापों व अवसर अधिकारों के बाद ही पूरी होती है।
अब रही बात नर नारियों के नयनसुख व छेड़खानी की तो यह बात सोलह आने सत्य है क़ि सर्वाधिक छेड़खानी आदि की घटनाये मंदिर मस्जिद मे कथित भगवान के सामने या उसके आस पास ही होती हैं।
ऐसे मे यह बात साफ हो जाती है क़ि किसी भी धर्म स्थल मे जाना या न जाने से इन्शान की सेहत पर कोई प्रभाव नही पड़ता।
हां पण्डे पुजारी मुल्ला पादरी आदि जरूर सेहतमंद हो जाते हैं।
🇮🇳🇮🇳9*4*5💐💐💐💐💐
क्या उन्ही मे से किन्ही समझदार लोगों ने समाज के सुविधा विपन्न अर्थात निर्धन कमजोर लोगों (स्त्री व पिछड़े वर्गों के पुरुषों) को कथित मंदिर मस्जिद मे घुसने से रोका था???
ताकि इनकी छेड़खानी सहित आर्थिक शोषण से मुक्त किया जा सके। लेकिन ये शुद्र अछूत नर नारी गोबर के कीडे की भांति ही व्यवहार करेंगे। जाएगे बार बार गंदगी मे ही।
तभी सायद यह कहा गया क़ि
🤔"सौ सौ जुटा खाये तमाशा घुस कर देखन जाएं।"
इतिहास इस बात का गवाह है क़ि डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने कालाराम मंदिर के सामने आंदोलन इसलिए किया था क़ि लोगों को उनकी आर्थिक सामाजिक औकात दिखाई व बताई जा सके। सायद मुल्ला मौलबियो ने भी महिलाओ के मस्जिद प्रवेश पर इसी लिए रोक लगाई होगी क़ि छेड़खानी रोकने सहित सुविधा विपन्न लोगो को क्यों बुलाया जाये।
क्योंकि इनकी सारी साधुक्कड़ी महिला देख कर भाग खड़ी होती है। पता नही ~भगवांन~ कहीं स्त्रियों के बिभिन्न अंगो मे तो नही घुसा बैठा?????
लेकिन झूठ बोल कर धर्म स्थल मे बैठा प्रचारित किया गया।
यह बात सत्य है क़ि जब से वंचित तबकों के लिए धर्म स्थल खोले गए तब से उनकी हालत और भी बदतर हुई है। फिर चाहे वह अछूत पिछड़े रहें हो या सनातनी मुस्लिम महिलाएं।
बल्कि इन धर्म स्थलो मे प्रवेश की अनुमति के माध्यम से वंचित तबका उस दूषित व्यवस्था का भंजक बनने की बजाय पोषक बना है। जो क़ि उसकी मौलिक गुलामी मे और कई कीलें ठोंकना ही कहा जायेगा। लेकिन चालाक मुल्ला मौलवी पण्डे पुजारी तबका इन गुलामो को अपनी चाल मे हमेशा फसाए रखना चाहता है। उसमे मदद करते हैं, कथित समाज के मूर्ख नर नारी जो उसी गंदी व्यवस्था मे पड़े रहने हेतु संघर्ष भी करते हैं। ऐसे यह व्यवस्था और पक्की हो जाती है। अभी मुम्बई स्थित ख्वाजा की दरगाह मे महिला प्रवेश हेतु शिवसेना की महिलविंग क्यों सक्रिय रही?
क्यों उसकी महिलाविंग खुशी मे फूलकर कुप्पा हो चुकी है?
बड़ा सडयंत्र है इसमे।
संघी समझदार हैं उन्होंने हाल ही मे मुसलमानों की दरगाह मे महिलाओ को प्रवेश देकर एक तीर से दो निशाने साधे हैं
1~ मुस्लिम महिलाओ की गुलामी को चार चाँद लगा कर और पक्का कर दिया है।
2~ न्यायपालिका के माध्यम से संघी सवर्ण पंडा धर्मियों की मुसलमानों के धर्म इस्लाम मे सीधी घुसपैठ कर ली है।
ऐसे मे मुस्लिम पर्शनल लॉ बोर्ड आदि स्वयं निष्प्रभावी हो गए हैं। जो क़ि संघियो की इस्लाम मिटाओ नीति का बहुत पुराना एजेंडा रहा है।
🇮🇳🇮🇳9*4*5🤔🤔🤔🤔🤔
सवाल ये उठता है क़ि क्या समाज कानून के बल पर हांका जा सकता है? किस किस काम को रोकने के लिए कानून बनाओगे?
या
कानून का दायरा वहां से शुरू होता है जहां से धर्म का दायरा खत्म हो जाता है लोगों मे सामाजिक बन्धन कमजोर हो जाते हैं और कोई समाजिक समस्या पूरे समाज के लिए कोढ़ बन जाती है। अब सवाल उठता है क़ि क्या महिलाओं के मन्दिर या दरगाह प्रवेश को लेकर बनी व्यवस्था से समाज मे कोई मौलिक समस्या आ खड़ी हुई थी या इसे ब्राह्मण धर्मियों द्वारा निजी हित साधने हेतु मुद्दा बनाकर उछाला गया ?
ऐसे मे मुम्बई की दरगाह मे बनी धार्मिक व्यवस्था से महिलाओ को फायदा हो न हो लेकिन मानव जाति को फायदा था क़ि नहीं?
फिर भी इनके द्वारा दरगाह प्रवेश के नाम हिंदुओं के उकसावे मे आकर आंदोलन चलाना क्या समझदारी कहा जायेगा या मूर्खता?????
वो वाग गुलिस्तां क्या होगा जहा हर डाल पर उल्लू बैठा हो।
आपका मंगल हो आप निरोगी हो स्वस्थ हों
🇮🇳🇮🇳9*4*5💐💐💐💐💐💐
भवतु सब्ब मंगलं
सब्बे सत्ता सुखी होंतु सब्बे होन्तु चखेमिनो .......
जय जयय भूमि जय मूलनिवासी
https://indianexpress.com/article/india/india-news-india/bombay-high-court-allows-entry-of-muslim-women-at-haji-ali-dargah/lite/
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http://m.patrika.com/news/lucknow/after-haji-ali-dargah-mumbai-hig-hcourt-order-women-want-entry-in-this-temple-1383988/
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अक्सर ये देखा गया है क़ि विभिन्न धर्मो के लोग अपने अपने धर्म स्थलों मे रोज जाना चाहते है। जबकि यह बात दुनिया को पता है क़ि किसी भी धर्म स्थल मे भगवान ईश्वर अल्लाह आदि का निवास नहीं है। फिर भी उसमे प्रवेश पर रोक व घुसने की जद्दोजहद क्यों?
क्या कबीर साहेब ने इसीलिए कहा था क़ि
न मैं मन्दिर, न मैं मस्जिद, न काबे कैलास मे।
खोजी होय तो तुरत ही मिलये पल भर की तलास मे।।
यदि समानता की दृष्टि से देखा जाये तो धर्म स्थल प्रवेश की मांग कुछ हद तक जायज प्रतीत होती है। लेकिन जब यह बात पता है क़ि ईश्वर भगवान मौला का निवास कथित इन्शान निर्मित धर्म स्थल नहीं है फिर भी उसके लिए संघर्ष समझ से परे है।
अक्सर लोग धर्म स्थल जाते ही क्यों है??????
इस संदर्भ मे देखा गया है क़ि धर्म स्थल जाने वाले लोग दो श्रेणी के होते हैं-
एक वो जो पूजा के नाम पर झूठी उम्मीद या कथित भगवान की चमचागीरी के लिए जाते हैं।
दूसरे वो जो नयनसुख व छेड़खानी के लिए जाते हैं। कभी कहा जाता था क़ि मैं तुमसे मिलने आई मंदिर जाने के बहाने। आज वह जगह बदल कर मन्दिर के स्थान पर कोचिंग सेंटर हो गए हैं।
ऐसे मे जब क़ि यह पता है क़ि इन्शान ने बनाए कथित धर्म स्थल मे कोई भगवान नही है तो फिर किसी भी प्रकार की उम्मीद उस पत्थर के घर से रखना मूर्खता के सिवाय कुछ नही है। जो भी उम्मीद पूरी होती है वह इंशान के स्वयं के मौलिक क्रिया कलापों व अवसर अधिकारों के बाद ही पूरी होती है।
अब रही बात नर नारियों के नयनसुख व छेड़खानी की तो यह बात सोलह आने सत्य है क़ि सर्वाधिक छेड़खानी आदि की घटनाये मंदिर मस्जिद मे कथित भगवान के सामने या उसके आस पास ही होती हैं।
ऐसे मे यह बात साफ हो जाती है क़ि किसी भी धर्म स्थल मे जाना या न जाने से इन्शान की सेहत पर कोई प्रभाव नही पड़ता।
हां पण्डे पुजारी मुल्ला पादरी आदि जरूर सेहतमंद हो जाते हैं।
🇮🇳🇮🇳9*4*5💐💐💐💐💐
क्या उन्ही मे से किन्ही समझदार लोगों ने समाज के सुविधा विपन्न अर्थात निर्धन कमजोर लोगों (स्त्री व पिछड़े वर्गों के पुरुषों) को कथित मंदिर मस्जिद मे घुसने से रोका था???
ताकि इनकी छेड़खानी सहित आर्थिक शोषण से मुक्त किया जा सके। लेकिन ये शुद्र अछूत नर नारी गोबर के कीडे की भांति ही व्यवहार करेंगे। जाएगे बार बार गंदगी मे ही।
तभी सायद यह कहा गया क़ि
🤔"सौ सौ जुटा खाये तमाशा घुस कर देखन जाएं।"
इतिहास इस बात का गवाह है क़ि डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने कालाराम मंदिर के सामने आंदोलन इसलिए किया था क़ि लोगों को उनकी आर्थिक सामाजिक औकात दिखाई व बताई जा सके। सायद मुल्ला मौलबियो ने भी महिलाओ के मस्जिद प्रवेश पर इसी लिए रोक लगाई होगी क़ि छेड़खानी रोकने सहित सुविधा विपन्न लोगो को क्यों बुलाया जाये।
क्योंकि इनकी सारी साधुक्कड़ी महिला देख कर भाग खड़ी होती है। पता नही ~भगवांन~ कहीं स्त्रियों के बिभिन्न अंगो मे तो नही घुसा बैठा?????
लेकिन झूठ बोल कर धर्म स्थल मे बैठा प्रचारित किया गया।
यह बात सत्य है क़ि जब से वंचित तबकों के लिए धर्म स्थल खोले गए तब से उनकी हालत और भी बदतर हुई है। फिर चाहे वह अछूत पिछड़े रहें हो या सनातनी मुस्लिम महिलाएं।
बल्कि इन धर्म स्थलो मे प्रवेश की अनुमति के माध्यम से वंचित तबका उस दूषित व्यवस्था का भंजक बनने की बजाय पोषक बना है। जो क़ि उसकी मौलिक गुलामी मे और कई कीलें ठोंकना ही कहा जायेगा। लेकिन चालाक मुल्ला मौलवी पण्डे पुजारी तबका इन गुलामो को अपनी चाल मे हमेशा फसाए रखना चाहता है। उसमे मदद करते हैं, कथित समाज के मूर्ख नर नारी जो उसी गंदी व्यवस्था मे पड़े रहने हेतु संघर्ष भी करते हैं। ऐसे यह व्यवस्था और पक्की हो जाती है। अभी मुम्बई स्थित ख्वाजा की दरगाह मे महिला प्रवेश हेतु शिवसेना की महिलविंग क्यों सक्रिय रही?
क्यों उसकी महिलाविंग खुशी मे फूलकर कुप्पा हो चुकी है?
बड़ा सडयंत्र है इसमे।
संघी समझदार हैं उन्होंने हाल ही मे मुसलमानों की दरगाह मे महिलाओ को प्रवेश देकर एक तीर से दो निशाने साधे हैं
1~ मुस्लिम महिलाओ की गुलामी को चार चाँद लगा कर और पक्का कर दिया है।
2~ न्यायपालिका के माध्यम से संघी सवर्ण पंडा धर्मियों की मुसलमानों के धर्म इस्लाम मे सीधी घुसपैठ कर ली है।
ऐसे मे मुस्लिम पर्शनल लॉ बोर्ड आदि स्वयं निष्प्रभावी हो गए हैं। जो क़ि संघियो की इस्लाम मिटाओ नीति का बहुत पुराना एजेंडा रहा है।
🇮🇳🇮🇳9*4*5🤔🤔🤔🤔🤔
सवाल ये उठता है क़ि क्या समाज कानून के बल पर हांका जा सकता है? किस किस काम को रोकने के लिए कानून बनाओगे?
या
कानून का दायरा वहां से शुरू होता है जहां से धर्म का दायरा खत्म हो जाता है लोगों मे सामाजिक बन्धन कमजोर हो जाते हैं और कोई समाजिक समस्या पूरे समाज के लिए कोढ़ बन जाती है। अब सवाल उठता है क़ि क्या महिलाओं के मन्दिर या दरगाह प्रवेश को लेकर बनी व्यवस्था से समाज मे कोई मौलिक समस्या आ खड़ी हुई थी या इसे ब्राह्मण धर्मियों द्वारा निजी हित साधने हेतु मुद्दा बनाकर उछाला गया ?
ऐसे मे मुम्बई की दरगाह मे बनी धार्मिक व्यवस्था से महिलाओ को फायदा हो न हो लेकिन मानव जाति को फायदा था क़ि नहीं?
फिर भी इनके द्वारा दरगाह प्रवेश के नाम हिंदुओं के उकसावे मे आकर आंदोलन चलाना क्या समझदारी कहा जायेगा या मूर्खता?????
वो वाग गुलिस्तां क्या होगा जहा हर डाल पर उल्लू बैठा हो।
आपका मंगल हो आप निरोगी हो स्वस्थ हों
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भवतु सब्ब मंगलं
सब्बे सत्ता सुखी होंतु सब्बे होन्तु चखेमिनो .......
जय जयय भूमि जय मूलनिवासी
https://indianexpress.com/article/india/india-news-india/bombay-high-court-allows-entry-of-muslim-women-at-haji-ali-dargah/lite/
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http://m.patrika.com/news/lucknow/after-haji-ali-dargah-mumbai-hig-hcourt-order-women-want-entry-in-this-temple-1383988/
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