विश्व शिरोमणि बहुजन समाज के संत कबीर साहेब के अनुसार "समाधी" क्या है, का बहुत ही मार्मिक वर्णन।
🇮🇳🇮🇳9*4*5🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
वो कहते हैं क़ि
1~संतो सहज समाधी भली।
साधु से मिलन भयो जा दिन ते, सूरत न अंत चली।।
2~आँख न मुँदू, कान न रूंधू काया कष्ट न धारूँ।
खुले नैन से हँस हँस देखूँ, सुंदर रूप निहारूँ।।
3~कहूँ सो नाम, सुनूँ सो सुमिरन, जो कुछ करूँ सो पूजा।
गिरह उधान एक सम देखूँ भाव मिटाऊँ दूजा।।
🇮🇳🇮🇳9*4*5🌷🌷🌷🌷🌷
4~जहाँ जहाँ जाऊँ सोइ परिकरमा, जो कुछ करूँ सो सेवा।
जब सोऊँ तब करूँ दण्डवत, पूजूँ और न देवा।।
5~शब्द निरंतर मनुआ रटा, मलिन वचन का त्यागी।
उठत बैठत कबहुँ न बिसरे, ऐसी तारी लागी।
6~कहें कबीर यह उनमनि रहनी, सो परगट कर गाई।
सुख दुख के परे, इक परम सुख, तेहि मे रहा समाई।।
🇮🇳🇮🇳9*4*5🌷🌷🌷🌷🇮🇳
ऐसी है हमारे संतो की समाधी।
साहेब बंदगी जय मूलनिवासी
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वो कहते हैं क़ि
1~संतो सहज समाधी भली।
साधु से मिलन भयो जा दिन ते, सूरत न अंत चली।।
2~आँख न मुँदू, कान न रूंधू काया कष्ट न धारूँ।
खुले नैन से हँस हँस देखूँ, सुंदर रूप निहारूँ।।
3~कहूँ सो नाम, सुनूँ सो सुमिरन, जो कुछ करूँ सो पूजा।
गिरह उधान एक सम देखूँ भाव मिटाऊँ दूजा।।
🇮🇳🇮🇳9*4*5🌷🌷🌷🌷🌷
4~जहाँ जहाँ जाऊँ सोइ परिकरमा, जो कुछ करूँ सो सेवा।
जब सोऊँ तब करूँ दण्डवत, पूजूँ और न देवा।।
5~शब्द निरंतर मनुआ रटा, मलिन वचन का त्यागी।
उठत बैठत कबहुँ न बिसरे, ऐसी तारी लागी।
6~कहें कबीर यह उनमनि रहनी, सो परगट कर गाई।
सुख दुख के परे, इक परम सुख, तेहि मे रहा समाई।।
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ऐसी है हमारे संतो की समाधी।
साहेब बंदगी जय मूलनिवासी
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