संघी आस्था और अम्बेडकरवादी आस्था मे किसकी आस्था अच्छी किसकी खराब?
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डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर परिवर्तनवादी थे। उन्होंने कभी बहिस्कृत हितकारिणी सभा बनाई। फिर उनकी प्रासंगिकता खत्म होते ही schedule caste federation भी बनाई आदि आदि आदि।
हमारे लोग यदि उनके 70 साल पुराने विचारों को बिना जरूरी सुधार के जस का तस मानते रहेगें तो उस 70 साल तक होते रहे परिवर्तन समाहित न होने की बजह से हम समय से पिछड़ नही रहे हैं क्या?
पुरातनगामी संघी है और पुरातनगामी हम भी हो गए। तो यही तो आस्था है। फिर संघियो पण्डे पुजारियों की आस्था बुरी और हमारी डॉ अम्बेडकरवादी आदि आस्था सही कैसे कही जा सकती है?
आस्थावादी तो दोनो ही हो गए।
बस अंतर इतना है क़ि एक अम्बेडकरवादी आस्था है दूसरी संघी पण्डे पुजारीवादी।
बुरी तो दोनो ही होंगीं। न क़ि ये क़ि मेरी आस्था ठीक और संघियो की खराब। ऐसा कैसे कहा जा सकता है?
दूसरे की आस्था खराब केवल इसलिए नही खराब कही जा सकती क़ि वह दूसरे की है।
पुरातनगामी होना ही आस्था है।
अपनी बीते हुए कल से चिपके रहना ही आस्था है।
अपने बीते कल से लगाव की पराकास्ठा ही आस्था है।
जो क़ि हमे सुखद अनुभव होती है। क्योंकि हम स्वयं निठल्ले बन कर दूसरे के भरोसे अपना जीवन चलाना चाहते हैं। स्वयं केवल ताली पीटना या ही ही हा हा करना चाहते है। क्योंकि यह आसान है। इसमे कोई ऊर्जा श्रजन मे नहीं लगती। इस लिए हमे आराम या आसानी होती है।
यह हमारा चेतन शरीर कम से कम खर्च मे ज्यादा से ज्यादा आराम करना चाहता हैं। इसी कमजोरी का फायदा उठा कर पण्डे पुजारी, मुल्ला मौलवी, भंते श्रमण आदि वर्ग निर्मित हुआ जो इस भेड बकरी वर्ग को मार्ग दिखाकर आगे ले जा सकें (महाकपि जातक)।
अब भेड बकरियों को भी आसानी हो गई।
अब कोई सुरक्षा की चिंता नही रही। क्योंकि संख्या बल स्वयं सुरक्षा देता है।
न ही कोई रास्ता देखने समझने की जरूरत।
अब तो बस मजे ही मजे हैं केवल मुंडी नीचे डाल कर धूल उडाते हुए। एक दूसरे को धक्का देते गरियाते भे भे करते पुन्दक्याना भर करने को रह गया। जिंदगी मौज हो गई और यात्रा पिकनिक।
अब ऐसी यात्रा कौन नहीं करना चाहेगा?
जिसमे केवल मौज ही मौज हो।
मजा ही मजा हो
अब तो जो भी करना है भंते श्रमण को करना है।
जो भी करना है मुल्ला मौलवी को करना है।
जो भी करना है वह तो पंडे पुजारी को करना है।
अब तो मौज से कटेगी।
बल्कि कट ही रही है।
है क़ि नहीं??
मगर क्या?
नमो भारत जय भूमि
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डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर परिवर्तनवादी थे। उन्होंने कभी बहिस्कृत हितकारिणी सभा बनाई। फिर उनकी प्रासंगिकता खत्म होते ही schedule caste federation भी बनाई आदि आदि आदि।
हमारे लोग यदि उनके 70 साल पुराने विचारों को बिना जरूरी सुधार के जस का तस मानते रहेगें तो उस 70 साल तक होते रहे परिवर्तन समाहित न होने की बजह से हम समय से पिछड़ नही रहे हैं क्या?
पुरातनगामी संघी है और पुरातनगामी हम भी हो गए। तो यही तो आस्था है। फिर संघियो पण्डे पुजारियों की आस्था बुरी और हमारी डॉ अम्बेडकरवादी आदि आस्था सही कैसे कही जा सकती है?
आस्थावादी तो दोनो ही हो गए।
बस अंतर इतना है क़ि एक अम्बेडकरवादी आस्था है दूसरी संघी पण्डे पुजारीवादी।
बुरी तो दोनो ही होंगीं। न क़ि ये क़ि मेरी आस्था ठीक और संघियो की खराब। ऐसा कैसे कहा जा सकता है?
दूसरे की आस्था खराब केवल इसलिए नही खराब कही जा सकती क़ि वह दूसरे की है।
पुरातनगामी होना ही आस्था है।
अपनी बीते हुए कल से चिपके रहना ही आस्था है।
अपने बीते कल से लगाव की पराकास्ठा ही आस्था है।
जो क़ि हमे सुखद अनुभव होती है। क्योंकि हम स्वयं निठल्ले बन कर दूसरे के भरोसे अपना जीवन चलाना चाहते हैं। स्वयं केवल ताली पीटना या ही ही हा हा करना चाहते है। क्योंकि यह आसान है। इसमे कोई ऊर्जा श्रजन मे नहीं लगती। इस लिए हमे आराम या आसानी होती है।
यह हमारा चेतन शरीर कम से कम खर्च मे ज्यादा से ज्यादा आराम करना चाहता हैं। इसी कमजोरी का फायदा उठा कर पण्डे पुजारी, मुल्ला मौलवी, भंते श्रमण आदि वर्ग निर्मित हुआ जो इस भेड बकरी वर्ग को मार्ग दिखाकर आगे ले जा सकें (महाकपि जातक)।
अब भेड बकरियों को भी आसानी हो गई।
अब कोई सुरक्षा की चिंता नही रही। क्योंकि संख्या बल स्वयं सुरक्षा देता है।
न ही कोई रास्ता देखने समझने की जरूरत।
अब तो बस मजे ही मजे हैं केवल मुंडी नीचे डाल कर धूल उडाते हुए। एक दूसरे को धक्का देते गरियाते भे भे करते पुन्दक्याना भर करने को रह गया। जिंदगी मौज हो गई और यात्रा पिकनिक।
अब ऐसी यात्रा कौन नहीं करना चाहेगा?
जिसमे केवल मौज ही मौज हो।
मजा ही मजा हो
अब तो जो भी करना है भंते श्रमण को करना है।
जो भी करना है मुल्ला मौलवी को करना है।
जो भी करना है वह तो पंडे पुजारी को करना है।
अब तो मौज से कटेगी।
बल्कि कट ही रही है।
है क़ि नहीं??
मगर क्या?
नमो भारत जय भूमि
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