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क्या मानववाद बसुधैवकुटुम्बकम् राष्ट्रवाद का मुकाबला कर सकते हैं?

आज भारत मे राष्ट्रवाद की जरूरत है या बुद्ध के मानववाद की?                  अथवाक्या मानववाद बसुधैवकुटुम्बकम् राष्ट्रवाद का मुकाबला कर सकते हैं?

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क्या राष्ट्र की सीमा असुरक्षित रखते हुए हम अपने घरों मे सुरक्षित रह सकते हैं?

यदि भारतवासी अपने पड़ोसी देशों से नफरत करना बंद भी कर दें तो क्या चीन भारत को अपना दुश्मन नहीं मानेगा?

क्या पाकिस्तान भारत को अपना दुश्मन नहीं मानेगा?

क्या बांग्लादेशी भारत को अपना घर बनाने का प्रयास नहीं करेंगे?

म्यांमार के सैनिक भारतीय भूभाग पर कब्जा नहीं करेंगे क्या?

समुद्री सीमाओं से भारत खुद को सुरक्षित रख पायेगा?

यदि उक्त सवालों के जबाब सकारात्मक हो सकतें है तो ही हम राष्ट्रवाद के विरोध कर मानववाद का समर्थन कर सकते हैं अन्यथा नहीं।
कुछ बाते केवल लोगों का मन बहलाने के लिए ही अच्छी होती हैं। उन्ही मे कुछ है मानववाद और बसुधैवकुटुम्बकम्।
विज्ञान के जो नियम होते हैं उनके भी अपवाद होते हैं।
क्या यह नही माना जा सकता क़ि यह मानववाद ही था जिसकी बजह से भिक्षुओं के सर कलम किये जाते रहे और ये मानववाद मे खोये रहे।
क्या यह मानववाद ही नही था जिसकी बजह से शकों, कुषाणों, हुड़ों, आर्यों, मुग़लों अंग्रेजों आदि का हम स्वागत करते रहे???
और वो आक्रांता हमारी ठुकाई का इंतेजाम करते रहे।
क्या अभी और कोई कसर बाकी है गुलामी मे?
जब कोई पड़ोसी किसी के घर या सामान आदि पर कब्जा करने की कोशिस करता है तो हम क्यों नही उसे ऐसा करने देते? जबकि हम तो कथित मानववादी हैं।
क्यों जब संघी सवर्ण हमारे आरक्षण पर हमला कर छिनते है तो हमे तो उनका स्वागत करना चाहिए? यदि हम सच्चे मानववादी है तो।
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मुझे लगता है क़ि आप लोग ऐसा बिल्कुल भी नही चाहोगे। इसलिए राष्ट्रवाद तो जरूरी अंग है सभी मानवों का।
हां ये बात और है क़ि संघियो का राष्ट्रवाद असल मे राष्ट्रवाद नहीं बल्कि *फांसीवाद है, नस्लवाद है।*
जो संघी सवर्ण स्वयं विदेशी हों वह दूसरे के राष्ट्र को प्रेम कर भी कैसे सकते है। जाहिर है क़ि नही कर सकते। जब राष्ट्रप्रेमी नही हो सकते तो राष्ट्रवादी कैसे हो सकते हैं?
नमो भारत जय भूमि

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