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May day या मजदूर दिवस: एक विहंगम दृष्टिपात





 पहली मई को मजदूर दिवस संपूर्ण विश्व में मनाया जाता है। इसका इतिहास भूगोल से मुझे कोई वास्ता नहीं लेकिन इसकी पीछे की वजहों को जानना मेरा मौलिक अधिकार है।
कार्ल मार्क्स पक्का नशेड़ी था क्योंकि यह कहता है कि दुनिया के मजदूरों एक हो पूंजीवाद को उखाड़ फेंको।

अब पूँछो कि इसमें ग़लत क्या है।
मजदूरों को एकजुट होने की जरूरत तभी तक है जब तक वे मजदूर हैं और जब तक वे मजदूर हैं तभी तक दूसरे लोग मालिक (पूंजीपति) भी हैं। मालिक व मज़दूरों के बीच स्थायी संघर्ष अन्तिमता मालिक पूंजीपतियों को ही मजबूत करता आया है। भला भेड़ व सांड में युध्द होने पर भेड़ की जीत की उम्मीद लगाना कहाँ की चतुराई है। यह संघर्ष स्थायी रूप से चलता रहे इसलिए मजदूरों को गंदगी में सड़ते हुए गंदगी को स्थायी बनाये रखने हेतु एकजुट होना जरूरी हैं। यह सोच के साथ उक्त नारा पूरे विश्व में उछाला गया।

जब तक मालिक मजदूरों में संघर्ष चलता रहेगा तभी तक मालिक "मालिक" रह सकेंगे और मजदूर भाई बहन "मजदूर'।
यह बात औसत बुद्धि इंसान को तब तक समझ नही आयेगी जब तक वह खुद के खाने पीने मौज मस्ती के लिए संघर्षरत है। इस दैनिक भरणपोषण संघर्ष से ऊपर उठते ही उक्त सारी बातें समझ आना शुरू होना तय है। जैसे ही आप खुद के शरीर की स्वायत्तता व संप्रभुता की चेतना से ओतप्रोत होंगे यह सारा षडयंत्र नग्न रूप से आपके सामने खड़ा होगा। चूंकि ज्यादातर इंसानों को भय केंद्रित कर रखा गया है इसीलिए हम सब मुर्गा मुर्गी भेड़ बकरी की भांति चराए जाने को ही विकास समझ बैठे। फिर चाहे भले ही बकरमंडी ले जाकर बलि चढ़ा दी जाए।
यह सारी दुष्टता का मूल है। यह दुष्टता Red for Ed अभियान में भी प्रतिबिंबित होता आया है। जो ब्रेन कंट्रोल भेड़ों की जमात आज दिख रही वह इसी रेड फॉर एड अभियान की ही देन है।
यह जमात अपने से भिन्न विचारवान व्यक्ति को खतरा मानती है। यही रेड कलर आज ज्यादातर देशों की सेनाओं या पुलिस वर्दियों हेतु शोभायमान मान है। जो खून की निशानी है। अर्थात अपनी मालिको की रक्षा जीवनयापन हेतु खून देकर करना ही मजदूर दिवस कहलाता है।
यही अंतरराष्ट्रीय रेडक्रॉस सोसायटी की भी बुनियाद है।

ऐसे के मई दिवस की बधाइयों के रूप में मजदूर स्वयं अपनी कब्र खोदे तो इससे बडी मुर्खता और क्या होगी।

इंशानो को human being से human doing में तब्दील इन्ही कम्युनिस्टों ने ही किया हुआ है। आज जब हम सुबह उठकर जल्दी जल्दी काम या नौकरी या व्यापार के लिए भाग खड़े हो रहे यह हमारे माँ बाप की देन नही इन्ही कम्युनिस्टों की देन है। काम न करने पर भुंखो मरने की नौबत भी इन्ही कम्युनिस्ट की ही देन है। दुनियां ऐसी हमेशा से नहीं रही। बल्कि यह स्थिति मात्र पिछले 70 सालों में शिक्षा रोजगार के नाम से कायम किए गए कंट्रोल की देन है। आज से मात्र 40 साल पहले घर का एक आदमी कमाता था और 10 आदमी मौज से खाते थे और आज 10 में से 8 कमा रहे फिर भी सुकून गायब किया जा चुका है। भाईचारे की जगह छल कपट ठगी बेईमानी ने ले ली है। अब आलम यह बना दिया गया कि किशोर किशोरियों को भी श्रमिक बनाने की छूट कानूनी तौर पर दे दी गई है।
यह मानव जन्म का शोषण नहीं तो क्या है? जो बच्चे ६ साल में विद्यालय जाते थे आज वे ३ साल में ही स्कूल ठेल दिए जा रहे। इसी से तो ब्रेनडेड जोंबी की फसल खड़ी कर दी गई।

1 मई 1771 को इल्लुमिनिटी का गठन इन्ही कम्युनिस्ट दुष्टों ने ही किया था। इसीलिए संकट आने पर फौजी पूरे विश्व में may day -में डे चिल्लाने लगते हैं। जो हकीकत में mayhem अर्थात तबाही का दिन कहलाता है। अर्थात जिसका मतलब बचाओ बचाओ नहीं बल्कि 1 मई 1771 को ली गई प्रतिज्ञा को खतरा होता है।

एरिया 51 अमेरिका का सबसे खुफिया मिलिट्री बेस है। इसका नाम 51 इसीलिए है क्योंकि 1st- may (5th month of the year) अर्थात may day का यह लघु रुप है।

इसीलिए दुनिया मे जितने भी देशो के नामो में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक जुड़ा है जैसे कि democratic republic of india, democratic republic of cuba, democratic republic of north korea, democratic republic of russia, democratic republic of ...... आदि आदि आदि सभी कम्युनिस्ट देश ही हैं।

इसीलिए ज्यादातर कम्युनिस्ट देशों में वाहन हमेशा बाई (left ) साइड में चलाने का नियम बना है। यही leftist ritual है। यही वामपंथ है । जिसे हम लेफ्ट पार्टियों के रूप में देखते आए हैं। भारत मे सड़क पर लोग बाई साइड ही चलते हैं कभी हम लोगों ने इसकी पड़ताल क्यों नही की? ऐसा इसलिए क्योंकि हम में से ज्यादातर लोग भेड़ चाल, चल रहे हैं। भला जो चीजें जन्म से ही गाड़ कर मिली हों उनकी तस्दीक भला कौन करना चाहेगा? वह भी तब तक जब तक दुनिया में कुछ बेहद गलत न दिखने लगे। जो सच्चे अध्यात्म से ही संभव है।

बता दूं कि पूंजीवाद कोई कारक नही बल्कि साम्यवाद अर्थात कम्युनिस्ट दुष्टों की विचारधारा का परिणाम मात्र है। जब तक मजदूर हैं तभी तक मालिक हैं। जब तक मालिक हैं तभी तक पूंजीवाद व पूंजीपति हैं। अर्थात यदि पूंजीपतियों को खत्म करना चाहते हो तो साम्यवाद को खत्म कीजिए। ध्यान रहे साम्यवाद वह बिल्कुल नहीं है जो साम्यवादी या झामसेफी लोग बताते हैं। इसी साम्यवाद की शाखाएं  ब्राह्मणवाद अंबेडकरवाद समाजवाद लेनिनवाद मार्क्सवाद लोहियावाद पूंजीवाद सेकुलरिज्म आदि रही हैं।

बहुसंख्यक लोग दुखी तभी तक हैं जब तक दुनिया मे डेमोक्रेटिक डैमोक्रेसी है। यह क्या लोचा है आप समझने का प्रयास करो। नहीं समझ सकते हो तो सानिध्य में आओ।

यूनाइटेड नेशंस के logo में गेंहू की दो बालियां व धरती इसी कम्युनिस्ट विचारधारा की घोतक है। हँसिया से गेहूं काटा जाता है। हथौड़ा से धरती तोड़ी फोड़ी जाती है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र संघ के logo में हँसिया का पर्याय फसल और हथौड़ा का पर्याय धरती निहित है। आज इस संयुक्त राष्ट्र संघ में करीब 205 देश शामिल हैं। जिसका मतलब है पूरी दुनिया मे कम्युनिस्ट दुष्टों का ही राज चल रहा है। इसीलिए पूरी दुनिया मे व्याकुलता है। भारत में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद व सहायक संस्थानों के logo में बनी गेहूं की बालियां हम इंसानों की फसल का सूचक है। यही कारण है कि प्रत्येक इंसानी आबादी के नाम युक्त सड़क किनारे लगे बोर्डों का रंग हमेशा हरा होता है। यह ह्यूमन फार्मिंग को दर्शाता है। भारत की खुफिया एजेंसी का logo में भी गेहूं की बालियां किस लिए है?


सवाल यह कि हम सब मुर्गी फार्म में कैसे तब्दील हो गए? हम सब इंशानो को किसने मुर्गी फार्म में तब्दील कर डाला?
यदि आपके पास इन सवालों के जवाब नहीं है तो आपको उक्त बेहद महत्वपूर्ण तथ्य भी बेकार लगना तय है।

इसीलिए यदि मजदूर एक दूसरे को may day की बधाइयां देने लगे तो समझना चाहिए कि मुर्खता बहुत गहराई तक घुस चुकी है। मजदूरों में मूल समस्या की पहचान भी खो चुकी है। इस सब कुछ को खतरा सच्ची धर्मिकता से है इसीलिए कार्ल मार्क्स ने सबसे पहले "धर्म को ही अफीम" ठहराया। ये मार्क्स जानता था कि बाकी सब तो हमारे षड्यंत्र को नही समझ सकेंगे केवल सत्य धर्मी लोग ही मेरी पोल खोल सकते हैं। मेरा षडयंत्र समझ सकते हैं। इसीलिए इस बदमाश कार्ल मार्क्स ने धर्म को सबसे पहले अफीम ठहराया। चूंकि दुनिया के मजदूरों को एकजुट होने का आह्वान किया जा रहा जो स्वतः संयुक्त राष्ट्र संघ व भूमंडलीकरण को मजबूती देगा।

 भूमंडलीकरण होगा तो भारत का अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर खत्म होगा। संविधान खत्म होगा। मुर्गे मुर्गियां और ज्यादा ब्याकुल होने को मजबूर होंगी। जितने ज्यादा व्याकुल होंगे उतना ही मोटी रस्सी में कैद भी स्वीकार करने को तैयार होंगे। आज देश में लगातार बढ़ाई जा रही बेरोजगारी महगाई मारामारी आदि सब इसी प्लान का हिस्सा है जिसे न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के नाम से जाना जाता रहा है।

इसीलिए यह कम्युनिज्म ही भूमंडलीकरण की नींव बनी हुई है। इसीलिए कम्युनिस्ट पार्टियों का नाम "communist party of india, of america, of cuba, of pakistan, of russia, of north korea, of south korea आदि आदि है। इस भूमंडलीकरण को अमलीजामा पहनाने का काम UN व उसकी सहायक संस्थाएं एजेंडा 2030, 21 व सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स आदि के नाम से कर रही हैं।

चूंकि ज़्यादातर इंसानी मुर्गे मुर्गियां धर्म के नाम पर ठगे हुए या धर्मांध बनाये गए लोग हैं इसीलिए किसी को कुछ भी समझ ही नही आता। अर्थात इस बदमाशी में सारे धर्मो के धर्म गुरु जाने अंजाने शामिल रहे हैं।

फिर भी मूर्ख लोगों को लगता है कि सब दुनियां में खुला इशानी मुर्गिफार्म बहुत अच्छी बात है।
इसलिए मजदूरों को यदि आज़ादी चाहिए तो मई दिबस का क्रिटिकल विश्लेषण करें। अम्बेडकर वादी साथियों को विशेष सजगता की जरूरत है। सच्चाई कटु होती है महानुभाव इसलिए खुद के भाव संवेग को सम्हालिए। पुनः सोचिए समझिए इसके बाद उक्त लेख कई बार फिर से पढ़िए। बाहर देश समाज सड़क पर दिख रही सच्चाई से उक्त लेख की बातो को मैच करिए तब निर्णय लो, क्या उक्त लेख में मेरे द्वारा कही गई बातें सही नहीं है? अगर सही हैं तो अभी तक यह बातें कहीं भी आपको पढ़ाई बताई क्यों नहीं गई?
सवाल करिए।
भवतु सब्ब मंगलं☸
जय भारत भूमि🇮🇳
💐

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