प्रकरण संख्या 1
राष्ट्र के खिलाफ बगावत हेतु संविधान में दंडविधान निम्नवत हैं :-
१-आईपीसी के सेक्शन 121 और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 147 के अनुसार राज्य/भारत के खिलाफ युद्ध खड़ा करने पर मृत्युदंड, आजीवन कारावास या व जुर्माना किया जा सकता है।
२- आईपीसी के सेक्शन 121A और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 150 के अनुसार राष्ट्र के खिलाफ षड्यंत्र रचने पर आजीवन कारावास, 10 साल कैद या व जुर्माना लगाया जा सकता है।
३- आईपीसी के सेक्शन 122 और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 149 अनुसार राज्य के खिलाफ युद्ध की नियत से हथियार जुटाने पर आजीवन कारावास, 10 साल की जेल, या व जुर्माना लगाया जा सकता है।
४- आईपीसी के 123 और BNS के 148 के अनुसार राज्य के खिलाफ युद्ध की नियत से कुछ भी छिपाना 10 साल की उम्रकैद और जुर्माना थोपा जा सकता है।
५- आईपीसी के सेक्शन 124 और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 151 अनुसार राष्ट्रपति, राज्यपाल आदि पर सरकारी कामकाज में बाधा की नियति से हमला करने पर 7 साल की जेल और जुर्माना लगाया जा सकता है।
६- आईपीसी के सेक्शन 124A और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 152 के अनुसार राज्य सत्ता के खिलाफ शब्दों से, इशारों से या इलेक्ट्रॉनिक साधनों से असंतोष पैदा करने पर उम्रकैद या 3 साल की जेल या जुर्माना लगाया जा सकता है।
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प्रकरण संख्या - 2
*ईश्वर निंदा की स्थिति में संविधान में निर्धारित दंडविधान निम्नवत हैं:-*
1- धार्मिक भावनाओं को भड़काने पर BNS की सेक्शन 299 के अनुसार 3 साल की जेल, जुर्माना वह भी गैर जमानती। जो कि आईपीसी की 295ए में भी हूबहू SAME थे।
2- BNS के सेक्शन 298 अनुसार धर्म विशेष के पूजा स्थल को क्षतिग्रस्त करना, बेइज्जत करने की नियत से गंदा करने पर गैर जमानती जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। हूबहू यही दंड आईपीसी की 295 में भी थे।
3- BNS के 302 सेक्शन अनुसार धर्म विशेष के लिए अपशब्द बोलना, ऊलजलूल आवाजें निकालना या शोर करना, पूजा स्थल में धर्म विशेष हेतु वर्जित चीजें रखने पर 1 साल की गैर जमानती जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं जो कि पुरानी आईपीसी की 298 की फोटोकॉपी है।
१-आईपीसी के सेक्शन 121 और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 147 के अनुसार राज्य/भारत के खिलाफ युद्ध खड़ा करने पर मृत्युदंड, आजीवन कारावास या व जुर्माना किया जा सकता है।
२- आईपीसी के सेक्शन 121A और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 150 के अनुसार राष्ट्र के खिलाफ षड्यंत्र रचने पर आजीवन कारावास, 10 साल कैद या व जुर्माना लगाया जा सकता है।
३- आईपीसी के सेक्शन 122 और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 149 अनुसार राज्य के खिलाफ युद्ध की नियत से हथियार जुटाने पर आजीवन कारावास, 10 साल की जेल, या व जुर्माना लगाया जा सकता है।
४- आईपीसी के 123 और BNS के 148 के अनुसार राज्य के खिलाफ युद्ध की नियत से कुछ भी छिपाना 10 साल की उम्रकैद और जुर्माना थोपा जा सकता है।
५- आईपीसी के सेक्शन 124 और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 151 अनुसार राष्ट्रपति, राज्यपाल आदि पर सरकारी कामकाज में बाधा की नियति से हमला करने पर 7 साल की जेल और जुर्माना लगाया जा सकता है।
६- आईपीसी के सेक्शन 124A और भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 152 के अनुसार राज्य सत्ता के खिलाफ शब्दों से, इशारों से या इलेक्ट्रॉनिक साधनों से असंतोष पैदा करने पर उम्रकैद या 3 साल की जेल या जुर्माना लगाया जा सकता है।
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प्रकरण संख्या - 2
*ईश्वर निंदा की स्थिति में संविधान में निर्धारित दंडविधान निम्नवत हैं:-*
1- धार्मिक भावनाओं को भड़काने पर BNS की सेक्शन 299 के अनुसार 3 साल की जेल, जुर्माना वह भी गैर जमानती। जो कि आईपीसी की 295ए में भी हूबहू SAME थे।
2- BNS के सेक्शन 298 अनुसार धर्म विशेष के पूजा स्थल को क्षतिग्रस्त करना, बेइज्जत करने की नियत से गंदा करने पर गैर जमानती जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। हूबहू यही दंड आईपीसी की 295 में भी थे।
3- BNS के 302 सेक्शन अनुसार धर्म विशेष के लिए अपशब्द बोलना, ऊलजलूल आवाजें निकालना या शोर करना, पूजा स्थल में धर्म विशेष हेतु वर्जित चीजें रखने पर 1 साल की गैर जमानती जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं जो कि पुरानी आईपीसी की 298 की फोटोकॉपी है।
सवाल यह कि
१- राष्ट्र और धर्म दोनों को अपनी निंदा से डर क्यों लगता है?
२- निंदक निअरे राखिए परंपरा वालों हेतु धर्म और राष्ट्र की निंदा दंडनीय होना आत्मघाती है या नहीं?* क्योंकि ऐसा स्वीकारना ही निंदा और निंदक दोनों के पर कतरना है।
३- धर्म और राष्ट्र निंदा दंडनीय अपराध है जो मनुस्मृति में किए गए दंड विधानों से भिन्न कैसे हैं?
४- डॉ बाबासाहब अंबेडकर ने कहा था कि धर्म लोगों के लिए है लोग धर्म के लिए नहीं हैं। उनका ऐसा मानना यह दर्शाता है कि हम भारत के लोग और हमारी मौलिक संप्रभुता और अभिव्यक्ति की आजादी "धर्म या राष्ट्र की परिभाषा" से सर्वोपरि है। फिर भी संविधान में ईश निंदा और राज्य निंदा को दंडनीय बनाना हम भारत के लोगों के स्वतंत्र चिंतन पर ताला डालना है या नहीं?
५- आईपीसी का भारतीय न्याय संहिता नामांतरण किए जाने पर आह्लादित जन समूह समझदार है या नासमझ? क्योंकि मौलिक चिंतन की आजादी तो सभी की छीनी जा रही है चाहे समर्थक हो या विरोधी।
१- राष्ट्र और धर्म दोनों को अपनी निंदा से डर क्यों लगता है?
२- निंदक निअरे राखिए परंपरा वालों हेतु धर्म और राष्ट्र की निंदा दंडनीय होना आत्मघाती है या नहीं?* क्योंकि ऐसा स्वीकारना ही निंदा और निंदक दोनों के पर कतरना है।
३- धर्म और राष्ट्र निंदा दंडनीय अपराध है जो मनुस्मृति में किए गए दंड विधानों से भिन्न कैसे हैं?
४- डॉ बाबासाहब अंबेडकर ने कहा था कि धर्म लोगों के लिए है लोग धर्म के लिए नहीं हैं। उनका ऐसा मानना यह दर्शाता है कि हम भारत के लोग और हमारी मौलिक संप्रभुता और अभिव्यक्ति की आजादी "धर्म या राष्ट्र की परिभाषा" से सर्वोपरि है। फिर भी संविधान में ईश निंदा और राज्य निंदा को दंडनीय बनाना हम भारत के लोगों के स्वतंत्र चिंतन पर ताला डालना है या नहीं?
५- आईपीसी का भारतीय न्याय संहिता नामांतरण किए जाने पर आह्लादित जन समूह समझदार है या नासमझ? क्योंकि मौलिक चिंतन की आजादी तो सभी की छीनी जा रही है चाहे समर्थक हो या विरोधी।
६- यदि हम सामने वाले के अनुसार ही बोलने /करने /चलने को मजबूर हुए तो हमारी मौलिक आजादी और संप्रभुता कहा बची? यही सब तो मनुस्मृति में निहित था जो संविधान, मनुस्मृति से भिन्न कैसे?
जय भारत भूमि ☸️🇮🇳♈
जय भारत भूमि ☸️🇮🇳♈

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