*22 प्रतिज्ञाएं व मुक्तिबोध।*
🌷🌷9*4*5☸☸☸☸🇮🇳
जिस प्रकार "नदी" दो किनारो के बीच बहती है। इन्ही दोनों किनारों से अठखेलियाँ करती हई चलती है। इन्ही दोनों किनारों के अंदर के सारे नजारे को पूरी दुनियां समझती है। लगभग कुछ इसी तरह का हमारा भी संसार है। मगर इतनी होशियार भी रहती है कि किसी भी एक किनारे द्वारा ज्यादा प्रेम व्यवहार की स्थिति में अठखेलियाँ जरूर उसके साथ करती है मगर दूसरे किनारे को बिल्कुल नही छोड़ती। जबकि इन्शान जिस जगह को पसंद करले तो समझो वही उसका ठिकाना। आज हम बहना भूल से गये हैं। हम किसी न किसी तट से चिपके हुए हैं। यही किनारे ही रिवर बैंक कहलाते है। इन्ही बैंकों पर हम लोग बैंक कर सकते हैं। यही बैंकिंग व्यवस्था है। इशानी समुह भी कुछ इसी अंदाज में चलते हैं। उदाहरण के लिए यदि हम डॉ बाबासाहेब अम्वेदकर के भक्तों को ही लें लें। जो रात दिन डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर के कार्यो का गुणगान तो यहां वहां करते रहते हैं। खुद भले ही उनके ठीक उलट क्रिया कलाप कर रहे हों।
यह स्थिति भी नदी के दो किनारों के समान ही है। जिसमे व्यक्ति को भ्रम तो होता है कि हम दूसरे जीव जन्तुओ से भिन्न है। वहीं हम अक्सर दूसरे किनारे पर रह रहे लोगों को देखकर खुद को दुखी या सुखी होने का नाटक करते रहते हैं। हमारे प्रत्येक क्रिया कलाप दूसरो से तुलना पर टिके हैं। दूसरो से तुलना पर ही हमारी हकीकत बनी हुई है। यदि सामने वाले लोग हमसे किसी मामले में ज्यादा मुफीद हैं तो हम उन्हें देख कर दुखी होते हैं जब विपरीत खड़े लोग हमसे कमतर स्थिति में होते है तो हमे खुद का सुखी होने का आभास होता है। यही है आज का सुख व दुख।
जाहिर है यह सुख व दुख की स्थिति संदेहास्पद है। शरीर को जीवित रखने के लिए अतिअनिवार्य वस्तुओँ के अतिरिक्त सभी आवस्यकताएँ व्यर्थ व दुख का मूल कारण के अलावा कुछ नहीं हैं। इंशानो के ज्यादातर दुख इसी सोच का परिचायक है। जब यही तृष्णा बेहद बढ़ जाती है तो "अवसाद" बन जाती है। यह अवसादग्रस्त शरीर खुद व खुद ढेरों बीमारियां बनाना शुरू कर देता है। इस प्रकार व्यक्ति खुद के बने जाल में लगातार फसता चला जाता है। जिसे चार चांद आज के विज्ञापन उद्योग, टीवी, अखबार, सिरियल व सड़क किनारे लगे होर्डिंग्स, बैनर पोस्टर, निऑन लाइटों आदि ने लगा रखे हैं। अर्थात आप जितना ज्यादा चकर्मकर करके यहाँ वहां देखोगे उतने ही ज्यादा अभावग्रस्त पाओगे। जितने ज्यादा स्वयं को अभाव का आभास होगा हम उतने ही ज्यादा दुखी व कुंठित होंगे। यही आपके अवसाद का कारण बन रहा।
आज के युगलो में यह समस्या सबसे ज्यादा हावी होती जा रही। जहां व्यक्ति की नही उसके द्वारा लाई गयी बस्तुओ की ज्यादा कद्र की जा रही। जो तमाम वाद, विवाद व परिवाद का कारण बन रही।
चूंकि व्यक्ति जब खुद अपना रास्ता बनाता है तो उसमें चुनौतियां सामने आती हैं। नए नए मंजर सामने आना स्वाभाविक है। जबकि हममे से ज्यादातर को ये चुनौतियां स्वीकार नही होती है। जिसे बद से बदतर घर परिवार व समाज का सरक्षण बना देता है। इस कारण हम केवल उन्ही रास्तों पर चलने के आदि बनते जाते हैं जिन पर पहले ही कोई "विश्वास प्राप्त व्यक्ति" चल चुका हो। इस कारण धीरे धीरे उक्त अनुभवी व्यक्ति धीरे धीरे हमारा आदर्श व्यक्ति बनता चला जाता है। इस प्रकार हम स्वतः की सक्रियता लगभग भूलने लगते हैं। हमे अतिविश्वास की स्थिति में थोड़ी बहुत देर भी अगर अमुक विश्वासी व्यक्ति का सानिध्य छूट जाए तो अनजान सा डर सताने लगता है। परिवार संस्था इसी डर को दबाने का साधन है।इसी डर से मुक्ति के लिए हमने दरवाजे, खिड़कियां, ताले आदि इजाद किये। मगर डर है कि पीछा नही छोड़ता।डर है किसी अज्ञात के होने का। डर है किसी अनजान होनी के घटित होने का। जाहिर सी बात है, चूंकि डर मन मस्तिष्क में है। बाहर हम चाहे जितने दरवाजे लगा लें। खिड़कियां बन्द ले। ताले जड़ दें, मगर डर पीछा छोड़ने वाला नही है। इससे स्नायु तंत्र और ज्यादा सक्रिय होना स्वाभाविक है। जिससे सर्दी में भी पशीने तो आएंगे ही फिर चाहे जितने एसी लगा लो। इस शबका रिजल्ट हृदयाघात, पक्षाघात जैसी परिस्थितियों में ही होता है।
जबकि यह सब कुछ अनाचार वास्तव में अपंगता के कारण ही हुआ। समझदार को चाहिए कि यह स्थिति देख तत्काल सानिध्य प्राप्त व्यक्ति को उसके अपने हाल पर छोड़ दे। अन्यथा सानिध्य प्राप्त व्यक्ति का स्वतंत्र बजूद ही खतरे में पड़ने से कोई नही रोक सकता। ठीक यही हाल आज के 22 प्रतिज्ञा बाजो का भी है। जिनको खुले समुंदर में छलाँग लगा गहराई नापने का आदि होना चाहिए था। जिन्हें आसमान नापना चाहिए था। मगर इन्होंने भी 22 प्रतिज्ञाएं रूपी नदी का एक किनारा पकड़ लिया। इस प्रकार हमने दूसरे के अनुभव को अपना अनुभव मान अपना एक किनारा पकड़ लिया। इस प्रकार दूसरे किनारे पर खड़े लोगों के पास उपलब्ध वस्तुओँ का स्वयं के पास होने पर कुंठा व न होने पर ख़ुशी का अहसास करना हमारी प्रकृति बन रहा है। जाहिर है कि यह खुशी या गम तुलनात्मक होने के कारण अस्थाई है। जाहिर है कि यह खुशी या गम कंडीशनल होने के कारण अस्थायी है। जैसे ही हमे ख़ुसी का अहसास होता है तब तक गम घेर लेता है।हम पुनः दुखी के दुखी ही बने रहते है। इस स्थिति की बारंबारता के कारण हम नशाखोरी आदि के चक्रव्यूह में फस जा रहे है। इसकी भयाभयता का नजारा किसी भी ठेके के आसपास चंद मिनट गुजारकर देखने से होना आसान है।
मगर हमें कोई भी व्यक्ति या वस्तु तभी तक अच्छी लगती है जब तक वह हमारे पास न हो। जैसे ही हम अमुक वस्तु या व्यक्ति को स्वयं के करीब पाते हैं। हम स्वतः ही तृप्ति को प्राप्त हो जाते हैं। यह तृप्ति अक्सर वैराग्य की ओर हमे अग्रसर करती है। वैराग्य में बच्चों वाले इन्द्रिय आनंद तत्व का लगभग अभाव व प्रज्ञा तत्व की भरपूर मात्रा में होता है। जिस कारण हम पुनः खुश होने का नया नया जरिया ढूंढने लगते हैं। जाहिर है फिर वही तुलनात्मक सुख व दुख का चक्र चालू हो जाता है। यह कृत्य ठीक एक बच्चे को उपलब्ध कराई गई प्रिय वस्तु के समान ही है। हम मनचाही वस्तु प्राप्त कर ठीक बच्चे के समान ख़ुसी हो जाते हैं। प्रिय वस्तु के खत्म होने या गुम होने पर पुनः बच्चे के समान हाथ पैर पटकना शुरू हो जाते। जिस प्रकार बच्चे को डांटने पर रोने लगता है ठीक यही आचरण हम स्त्री पुरुष भी करते हैं। आपको अगर कोई साड़ी, कपड़े, गहने को गिफ्ट रूप में लिए दिखे हमे समझना चाहिए कि किसी रोते हुए बच्चे को केला खिलाने की तैयारी है।
हम स्वयं को उम्रदराज मान कर अक्सर समझदार होने का भ्रम पाल लेते हैं। बल्कि अक्सर खुद से कम उम्र लोगों पर रुआब झाड़ने लगते हैं। जाहिर है कि अनुज भले ही किसी लोकलाज में आपकी बात उस समय सुन ले। मगर यह बिल्कुल भिन्न बात है कि अग्रज द्वारा बोली गयी बातें सही ही हों। मगर चूंकि अनुज व्यक्ति अग्रज से कम ग़लती किये हुए होता है इसी कारण हम अक्सर अग्रज की बात को अंतिम मानकर स्वीकार कर लेते हैं। इन्ही से निर्मित होती हैं हमारी धारणाएं। इन्ही धारणाओं को हम सच मान जीवन भर टैगिंग कर अजनबियों द्वारा कही गयी बातों का आंकलन सही व गलत के रूप में करते रहते हैं।
जाहिर है, चूंकि अक्सर हमारी धारणाएं ही गलत होती हैं। इसलिए हमारा जीवन ही गलत दिशा की ओर अग्रसर रहता है। हम करना कुछ चाहते हैं जबकि हो जाता है कुछ और। जिसकी परिणति अक्सर जेल, मुकदमों, झगड़ा फसाद, गालीगलौज में होती है। जिसकी अति होने पर ही व्यक्ति मानसिक रोगी हो जाता है। चूंकि रोग वैचारिक उद्गम के कारण है इसलिए पदार्थ रूप में दी गयी दवाइयां अक्सर इस विछिप्तता को दीर्घकालिक ही बनाती हैं।
स्वर्णिम बौद्धकाल में इस परिस्थिति का आकलन किया गया। तब शुरुआत हुई स्कूलिंग व विश्वविद्यालयी शिक्षा की। जो मूलतया अनुभूति जन्य थी। मगर आज बाह आंकलन की बजाय बाह गणना हेतु स्वयं का अनुकूलन मात्र बन चुकी है। इस कारण जितना ज्यादा बड़ा प्रमाणपत्र धारी उतना ही वह स्वयं बड़ी बीमारी।
ऐसे पिशाचों का निर्माण हृदय विहीन कामी, क्रोधी लालची, झुठे, धोखेबाज, मक्कार व फरेबियों की बृद्धि व विकास के लिए बिल्कुल अनुकूल है। यही कारण है कि अपराधियों की एक फसल कटती है तो दूसरी स्वतः तैयार हो जा रही है। जाहिर है कि इस कुचक्र का संचालन तब तक होता रहेगा जब तक इन्शान में मैं का बोध आन्तरिक नहीं कराया जाता।
यह आन्तरिक मैं का बोध बिना धम्मचर्या व विपस्सना के संभव नहीं है। अर्थात जब तक हम नदी के किसी एक भी किनारे को जकड़े रहेंगे। तब तक हम न तो कार्य कुशल बन सकते हैं और न ही समझदार।
लकीरों पर चलना चींटियों को ही शोभा दे सकता है, इंशानो को नही। मगर इन्शान की हालत आज चींटियों से भी बदतर हो चुकी है। शायद यही देख कर सतगुरु कबीर साहेब कहते हैं कि "आवन जावन हो रहा ज्यूँ चींटी का नांच"। अर्थात हम चींटियों की भांति जन्म ले रहे फिर मर जा रहे। बिना यह जाने समझे कि हम क्या है, कौन हैं, कहाँ से आये हैं, क्या करने आये हैं, आगे कहाँ को जा रहे?????
हम सब कुछ जानते है शिवाय स्वयं को नही जानते।
हम सब कुछ जानते है शिवाय स्वयं के विचारों व अवधारणाओं को नही जानते।
हम सब कुछ जानते है शिवाय सही व गलत को नही जानते।
इसके बावजूद हम डॉक्टर हैं। अधिकारी हैं। कर्मचारी हैं। अधिवक्ता है। इंजीनियर हैं। गाड़ी बंगले वाले हैं। हम भिक्षुओं संतों को कुछ नही समझते। जो शायद एक अचंभा से कम नहीं। बरना ऐसे इंशानो को जिन्हें स्वयं के वारे में कोई खबर न हो, वे भला बाह रुप से क्या सुधार कर सकेगे। यही कारण है कि ऐसे लोगों के पास जो अवसर व अधिकार हैं भी वे भी नही सम्हाले जा रहे।
इसलिए हमें नदी के किसी भी किनारे को पकड़कर चलने की आदत छोड़नी होगी।
हमे खुले समंदर में छलांग लगानी होगी।
हमे खुले आसमान में सैर सपाटा करना ही होगा।
यही हमारी प्रतिज्ञाएं होंगीं।
यही हमारी मुक्ति का बोध व मार्ग होगा।
स्वामी डॉ बोधी आनंद।
भवतु सब्ब मंगलं।☸☸
जय भारत भूमि🇮🇳
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जिस प्रकार "नदी" दो किनारो के बीच बहती है। इन्ही दोनों किनारों से अठखेलियाँ करती हई चलती है। इन्ही दोनों किनारों के अंदर के सारे नजारे को पूरी दुनियां समझती है। लगभग कुछ इसी तरह का हमारा भी संसार है। मगर इतनी होशियार भी रहती है कि किसी भी एक किनारे द्वारा ज्यादा प्रेम व्यवहार की स्थिति में अठखेलियाँ जरूर उसके साथ करती है मगर दूसरे किनारे को बिल्कुल नही छोड़ती। जबकि इन्शान जिस जगह को पसंद करले तो समझो वही उसका ठिकाना। आज हम बहना भूल से गये हैं। हम किसी न किसी तट से चिपके हुए हैं। यही किनारे ही रिवर बैंक कहलाते है। इन्ही बैंकों पर हम लोग बैंक कर सकते हैं। यही बैंकिंग व्यवस्था है। इशानी समुह भी कुछ इसी अंदाज में चलते हैं। उदाहरण के लिए यदि हम डॉ बाबासाहेब अम्वेदकर के भक्तों को ही लें लें। जो रात दिन डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर के कार्यो का गुणगान तो यहां वहां करते रहते हैं। खुद भले ही उनके ठीक उलट क्रिया कलाप कर रहे हों।
यह स्थिति भी नदी के दो किनारों के समान ही है। जिसमे व्यक्ति को भ्रम तो होता है कि हम दूसरे जीव जन्तुओ से भिन्न है। वहीं हम अक्सर दूसरे किनारे पर रह रहे लोगों को देखकर खुद को दुखी या सुखी होने का नाटक करते रहते हैं। हमारे प्रत्येक क्रिया कलाप दूसरो से तुलना पर टिके हैं। दूसरो से तुलना पर ही हमारी हकीकत बनी हुई है। यदि सामने वाले लोग हमसे किसी मामले में ज्यादा मुफीद हैं तो हम उन्हें देख कर दुखी होते हैं जब विपरीत खड़े लोग हमसे कमतर स्थिति में होते है तो हमे खुद का सुखी होने का आभास होता है। यही है आज का सुख व दुख।
जाहिर है यह सुख व दुख की स्थिति संदेहास्पद है। शरीर को जीवित रखने के लिए अतिअनिवार्य वस्तुओँ के अतिरिक्त सभी आवस्यकताएँ व्यर्थ व दुख का मूल कारण के अलावा कुछ नहीं हैं। इंशानो के ज्यादातर दुख इसी सोच का परिचायक है। जब यही तृष्णा बेहद बढ़ जाती है तो "अवसाद" बन जाती है। यह अवसादग्रस्त शरीर खुद व खुद ढेरों बीमारियां बनाना शुरू कर देता है। इस प्रकार व्यक्ति खुद के बने जाल में लगातार फसता चला जाता है। जिसे चार चांद आज के विज्ञापन उद्योग, टीवी, अखबार, सिरियल व सड़क किनारे लगे होर्डिंग्स, बैनर पोस्टर, निऑन लाइटों आदि ने लगा रखे हैं। अर्थात आप जितना ज्यादा चकर्मकर करके यहाँ वहां देखोगे उतने ही ज्यादा अभावग्रस्त पाओगे। जितने ज्यादा स्वयं को अभाव का आभास होगा हम उतने ही ज्यादा दुखी व कुंठित होंगे। यही आपके अवसाद का कारण बन रहा।
आज के युगलो में यह समस्या सबसे ज्यादा हावी होती जा रही। जहां व्यक्ति की नही उसके द्वारा लाई गयी बस्तुओ की ज्यादा कद्र की जा रही। जो तमाम वाद, विवाद व परिवाद का कारण बन रही।
चूंकि व्यक्ति जब खुद अपना रास्ता बनाता है तो उसमें चुनौतियां सामने आती हैं। नए नए मंजर सामने आना स्वाभाविक है। जबकि हममे से ज्यादातर को ये चुनौतियां स्वीकार नही होती है। जिसे बद से बदतर घर परिवार व समाज का सरक्षण बना देता है। इस कारण हम केवल उन्ही रास्तों पर चलने के आदि बनते जाते हैं जिन पर पहले ही कोई "विश्वास प्राप्त व्यक्ति" चल चुका हो। इस कारण धीरे धीरे उक्त अनुभवी व्यक्ति धीरे धीरे हमारा आदर्श व्यक्ति बनता चला जाता है। इस प्रकार हम स्वतः की सक्रियता लगभग भूलने लगते हैं। हमे अतिविश्वास की स्थिति में थोड़ी बहुत देर भी अगर अमुक विश्वासी व्यक्ति का सानिध्य छूट जाए तो अनजान सा डर सताने लगता है। परिवार संस्था इसी डर को दबाने का साधन है।इसी डर से मुक्ति के लिए हमने दरवाजे, खिड़कियां, ताले आदि इजाद किये। मगर डर है कि पीछा नही छोड़ता।डर है किसी अज्ञात के होने का। डर है किसी अनजान होनी के घटित होने का। जाहिर सी बात है, चूंकि डर मन मस्तिष्क में है। बाहर हम चाहे जितने दरवाजे लगा लें। खिड़कियां बन्द ले। ताले जड़ दें, मगर डर पीछा छोड़ने वाला नही है। इससे स्नायु तंत्र और ज्यादा सक्रिय होना स्वाभाविक है। जिससे सर्दी में भी पशीने तो आएंगे ही फिर चाहे जितने एसी लगा लो। इस शबका रिजल्ट हृदयाघात, पक्षाघात जैसी परिस्थितियों में ही होता है।
जबकि यह सब कुछ अनाचार वास्तव में अपंगता के कारण ही हुआ। समझदार को चाहिए कि यह स्थिति देख तत्काल सानिध्य प्राप्त व्यक्ति को उसके अपने हाल पर छोड़ दे। अन्यथा सानिध्य प्राप्त व्यक्ति का स्वतंत्र बजूद ही खतरे में पड़ने से कोई नही रोक सकता। ठीक यही हाल आज के 22 प्रतिज्ञा बाजो का भी है। जिनको खुले समुंदर में छलाँग लगा गहराई नापने का आदि होना चाहिए था। जिन्हें आसमान नापना चाहिए था। मगर इन्होंने भी 22 प्रतिज्ञाएं रूपी नदी का एक किनारा पकड़ लिया। इस प्रकार हमने दूसरे के अनुभव को अपना अनुभव मान अपना एक किनारा पकड़ लिया। इस प्रकार दूसरे किनारे पर खड़े लोगों के पास उपलब्ध वस्तुओँ का स्वयं के पास होने पर कुंठा व न होने पर ख़ुशी का अहसास करना हमारी प्रकृति बन रहा है। जाहिर है कि यह खुशी या गम तुलनात्मक होने के कारण अस्थाई है। जाहिर है कि यह खुशी या गम कंडीशनल होने के कारण अस्थायी है। जैसे ही हमे ख़ुसी का अहसास होता है तब तक गम घेर लेता है।हम पुनः दुखी के दुखी ही बने रहते है। इस स्थिति की बारंबारता के कारण हम नशाखोरी आदि के चक्रव्यूह में फस जा रहे है। इसकी भयाभयता का नजारा किसी भी ठेके के आसपास चंद मिनट गुजारकर देखने से होना आसान है।
मगर हमें कोई भी व्यक्ति या वस्तु तभी तक अच्छी लगती है जब तक वह हमारे पास न हो। जैसे ही हम अमुक वस्तु या व्यक्ति को स्वयं के करीब पाते हैं। हम स्वतः ही तृप्ति को प्राप्त हो जाते हैं। यह तृप्ति अक्सर वैराग्य की ओर हमे अग्रसर करती है। वैराग्य में बच्चों वाले इन्द्रिय आनंद तत्व का लगभग अभाव व प्रज्ञा तत्व की भरपूर मात्रा में होता है। जिस कारण हम पुनः खुश होने का नया नया जरिया ढूंढने लगते हैं। जाहिर है फिर वही तुलनात्मक सुख व दुख का चक्र चालू हो जाता है। यह कृत्य ठीक एक बच्चे को उपलब्ध कराई गई प्रिय वस्तु के समान ही है। हम मनचाही वस्तु प्राप्त कर ठीक बच्चे के समान ख़ुसी हो जाते हैं। प्रिय वस्तु के खत्म होने या गुम होने पर पुनः बच्चे के समान हाथ पैर पटकना शुरू हो जाते। जिस प्रकार बच्चे को डांटने पर रोने लगता है ठीक यही आचरण हम स्त्री पुरुष भी करते हैं। आपको अगर कोई साड़ी, कपड़े, गहने को गिफ्ट रूप में लिए दिखे हमे समझना चाहिए कि किसी रोते हुए बच्चे को केला खिलाने की तैयारी है।
हम स्वयं को उम्रदराज मान कर अक्सर समझदार होने का भ्रम पाल लेते हैं। बल्कि अक्सर खुद से कम उम्र लोगों पर रुआब झाड़ने लगते हैं। जाहिर है कि अनुज भले ही किसी लोकलाज में आपकी बात उस समय सुन ले। मगर यह बिल्कुल भिन्न बात है कि अग्रज द्वारा बोली गयी बातें सही ही हों। मगर चूंकि अनुज व्यक्ति अग्रज से कम ग़लती किये हुए होता है इसी कारण हम अक्सर अग्रज की बात को अंतिम मानकर स्वीकार कर लेते हैं। इन्ही से निर्मित होती हैं हमारी धारणाएं। इन्ही धारणाओं को हम सच मान जीवन भर टैगिंग कर अजनबियों द्वारा कही गयी बातों का आंकलन सही व गलत के रूप में करते रहते हैं।
जाहिर है, चूंकि अक्सर हमारी धारणाएं ही गलत होती हैं। इसलिए हमारा जीवन ही गलत दिशा की ओर अग्रसर रहता है। हम करना कुछ चाहते हैं जबकि हो जाता है कुछ और। जिसकी परिणति अक्सर जेल, मुकदमों, झगड़ा फसाद, गालीगलौज में होती है। जिसकी अति होने पर ही व्यक्ति मानसिक रोगी हो जाता है। चूंकि रोग वैचारिक उद्गम के कारण है इसलिए पदार्थ रूप में दी गयी दवाइयां अक्सर इस विछिप्तता को दीर्घकालिक ही बनाती हैं।
स्वर्णिम बौद्धकाल में इस परिस्थिति का आकलन किया गया। तब शुरुआत हुई स्कूलिंग व विश्वविद्यालयी शिक्षा की। जो मूलतया अनुभूति जन्य थी। मगर आज बाह आंकलन की बजाय बाह गणना हेतु स्वयं का अनुकूलन मात्र बन चुकी है। इस कारण जितना ज्यादा बड़ा प्रमाणपत्र धारी उतना ही वह स्वयं बड़ी बीमारी।
ऐसे पिशाचों का निर्माण हृदय विहीन कामी, क्रोधी लालची, झुठे, धोखेबाज, मक्कार व फरेबियों की बृद्धि व विकास के लिए बिल्कुल अनुकूल है। यही कारण है कि अपराधियों की एक फसल कटती है तो दूसरी स्वतः तैयार हो जा रही है। जाहिर है कि इस कुचक्र का संचालन तब तक होता रहेगा जब तक इन्शान में मैं का बोध आन्तरिक नहीं कराया जाता।
यह आन्तरिक मैं का बोध बिना धम्मचर्या व विपस्सना के संभव नहीं है। अर्थात जब तक हम नदी के किसी एक भी किनारे को जकड़े रहेंगे। तब तक हम न तो कार्य कुशल बन सकते हैं और न ही समझदार।
लकीरों पर चलना चींटियों को ही शोभा दे सकता है, इंशानो को नही। मगर इन्शान की हालत आज चींटियों से भी बदतर हो चुकी है। शायद यही देख कर सतगुरु कबीर साहेब कहते हैं कि "आवन जावन हो रहा ज्यूँ चींटी का नांच"। अर्थात हम चींटियों की भांति जन्म ले रहे फिर मर जा रहे। बिना यह जाने समझे कि हम क्या है, कौन हैं, कहाँ से आये हैं, क्या करने आये हैं, आगे कहाँ को जा रहे?????
हम सब कुछ जानते है शिवाय स्वयं को नही जानते।
हम सब कुछ जानते है शिवाय स्वयं के विचारों व अवधारणाओं को नही जानते।
हम सब कुछ जानते है शिवाय सही व गलत को नही जानते।
इसके बावजूद हम डॉक्टर हैं। अधिकारी हैं। कर्मचारी हैं। अधिवक्ता है। इंजीनियर हैं। गाड़ी बंगले वाले हैं। हम भिक्षुओं संतों को कुछ नही समझते। जो शायद एक अचंभा से कम नहीं। बरना ऐसे इंशानो को जिन्हें स्वयं के वारे में कोई खबर न हो, वे भला बाह रुप से क्या सुधार कर सकेगे। यही कारण है कि ऐसे लोगों के पास जो अवसर व अधिकार हैं भी वे भी नही सम्हाले जा रहे।
इसलिए हमें नदी के किसी भी किनारे को पकड़कर चलने की आदत छोड़नी होगी।
हमे खुले समंदर में छलांग लगानी होगी।
हमे खुले आसमान में सैर सपाटा करना ही होगा।
यही हमारी प्रतिज्ञाएं होंगीं।
यही हमारी मुक्ति का बोध व मार्ग होगा।
स्वामी डॉ बोधी आनंद।
भवतु सब्ब मंगलं।☸☸
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